पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/६२

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( ४२ ) करि सिंगार तापतें का जाऊँ। मोही देखहूँ ठावह ठाऊँ ॥ जौ जिउ महें तो उहै पियारा। तन मन सौं नह होइ निनारा ॥ नन माँह है उहै समाना । देखीं तहाँ नाहि कोड थाना ॥ अब यहाँ प्रश्न उठता है कि जायसी ने विषम प्रेम से क्यों प्रारंभ किया, ही से सम प्रेम क्यों नहीं लिया। इसका उत्तर यह है कि जायसी को इस प्रेम को लेकर भगवत्पक्ष में भी घटाना था । ईश्वर के प्रति प्रेम का उदय पहले भक्त के हृदय में होता है। ज्यों ज्यों यह प्रेम बढ़ता जाता है, त्यों त्यों भगवान् की कृपा- दष्टि भी जाती । होती है । यहाँ तक कि पूर्ण प्रेमदशा को प्राप्त भक्त भगवान् क भी प्रिय हो जाता है । प्रेमी होकर प्रिय होने की यह पद्धति भक्तों की है । भक्ति की साधना कि पहले हमें प्रिय लगेंपीछे प्रम के का क्रम यही है भगवान अपने के प्रभाव से हम भी भगवान् को प्रिय लगने लगेंगे । ईश्वरोन्मुख प्रम में घोर पहले कहा जा चुका है कि जायसी का झुकाव मत की ओोर था जिसमें जीवात्मा और परमात्मा में पारमार्थिक भेद न माना जाने पर भी साधकों के व्यवहार में ईश्वर की भावना प्रियतम के रूप में की जाती है । इन्होंने ग्रंथ के अंत सारी कहानी को अन्योक्ति कह दिया है और बीच बीच में भी उनका प्रेमवर्णन लौकिक पक्ष से अलौकिक पक्ष की ओर संकेत करता जान पड़ता षता के कारण कहीं कहीं इनके प्रेम को गंभीरता और व्यापकता नतता का है । इसी विशे- अग्रसर है। ‘रति के बहत से कवियों किया दिखाई पड़ती। भाव' का वर्णन हिंदी ने - कुछ लोगों का तो कहना है कि इसके अतिरिक्त और हमने किया ही क्या है पर एक प्रबंध के भीतर शुद्ध भाव के स्वरूप का ऐसा उत्कर्ष जो पाथिव प्रतिबंध स होकर आाध्यात्मिक क्षेत्र में जाता जायसी मुख्य लक्ष्य है । क्या दिखाई पड़ेका संयोग, क्या वियोग, दोनों में कवि प्रेम के उस प्राध्यात्मिक प्राभास देने लगता है, जगत् के समस्त व्यापार जिसकी छाया से प्रतीत होते हैं । । वियाग स्वरूप का पक्ष में जब कवि लोन होता है तब सूर्यचंद्र औौर नक्षत्र सब उसी परम रिह म जलते और चक्कर लगाते दिखाई देते हैं, प्राणियों का लौकिक वियोग जिसका भास मात्र है -- विरह के नागि सू जरि काँपा । रातिउ दिवस जरे मोहि तापा ॥ यद्यपि प्रकार की इस के विरहवर्णन की नहीं रही है, पर तुलसी की ‘विनयपत्रिका' में एक जगह ऐसे विश्वव्यापी विरद्द ओोर सगुण धारा के भक्तों प्रवृत्ति की भावना पाई जाती है बिछरे रबि ससि, मन ! नैनन पावत में दुख बहुतेरो धमत नमित निसि दिवस गगन महेंताँ रिपु राह बड़ेरो ॥ जद्यपि अति पुनीत सुर सरिता, ति पर सुज स घनेरो । तज चरन प्रज, न मिटत नित बहियो ताहू केरो ।