पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/६४

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( ४४ ) अब यदि कवि के स्पष्टीकरण के अनसार व्यंग्य अर्थ को ही प्रधान या प्रस्तुत मानें तो जहाँ जहाँ दूसरे अर्थ भी निकलते हैं, वहाँ वहाँ अन्योक्ति माननी पड़ेगी । पर ऐसे स्थल अधिकतर कथा के अंग हैं औौर पढ़ते समय कथा के प्रस्तुत होन धारणा किसी पाठक को हो नहीं सकती । इन स्थलों के बाच्यार्थी को नहीं कह सकते । इस प्रकार वाच्यार्थ के प्रस्तुत और व्यंग्यार्थ के अप्रस्तुत अतः अप्रस्तुत ऐसी जगह सर्वत्र समासोक्ति' । 'पद्मावत होने से ही माननी चाहिए ' के सारे वाक्यों के दोहरे अर्थ नहीं हैं, सर्वत्र अन्य पक्ष के व्यवहार का आारोप नहीं। है । केवल में कहीं कहीं दूसरे अर्थ की व्यंजना होती है । ये ग्राए हुए स्थलजसा वाच वाच कि कहा जा चुका , अंग हैं हैअधिकतर तो कथाप्रसंग के , जैसेदुग बोच बीच में मता और सिंहलद्वीप के मार्ग का वर्णनरनसेन का लोभ के कारण तूफान में पड़ना -सिंहलगढ़ की और लंका के राक्षस द्वारा बहकाया जाना । अतः इन स्थलों में बाच्याय स गये । अर्थ जो रखा है वह प्रबंध की प्रस्तुत साधनापक्ष में व्यंग्य गया ही कहा जा सकता है औौर ‘समासोक्ति' स्ही माननी पड़ती है । काव्य दृष्टि से एक छोटा सा उदाहरण लीजिएराजा रत्नसेन जब गए तब रानी पद्मावती इस प्रकार विलाप करती हैं । दिल्ली में कैद हो सो दिल्ली आस निबहुर देसू। केहि पूछहूँ, को कहै संदेयू जो कोइ जाइ तहाँ कर होई। जो श्रावै सा२ " किट जान न अगम पंथ पिय तहाँ सिधावा । जो रे गयड सो बहरि न आावा ॥ प्रबंध के भीतर ये सारे वाक्य प्रस्तुत प्रसंग का वर्णन करते हैं। परलोकयात्रा का अर्थ भी व्यंग्य है। यहाँ वाच्यार्थी को प्रस्तुत ौर व्यंग्यार्थी को पर इनमें अप्रस्तुत मानकर तथा ‘कोई किछ जान ' और 'बहर न वा' को दिल्लीगमन औौर परलोकगमन दोनों के सामान्य कार्य ठहराते हुएदिल्लीगमन में के व्यवहार का आारोप करके हम समासोक्ति ही कह सकते हैं । परलोकगमन जहाँ कथाप्रसंग से वस्तुओं के द्वारा प्रस्तुत प्रसंग की व्यंज ना होती भिन्न है वहाँ अन्योक्ति होगी, जैसे (क) सूर उदयगिरि चढ़त भुलाना । गहने गहा, कंवल कुंभिलाना ॥ यहाँ इस 'अप्रस्तुतके कथन द्वारा राजा रत्नसेन के सिंहलगढ़ पर चढ़ने औौर पकड़े जाने को व्यंजना की गई है । । दूसरा उदाहरण लीजिए- (ध) केवल जो बिगसा मानसरबिनु जल गयह सुखा ॥ अबढ़े वेलि फिर पलहैसींचे , जो पिय आाड़ । यहाँ जल कमल का प्रसंग प्रस्तुत नहीं है, प्रस्तुत है विरहिरणी की दशा । अतः यहाँ अप्रस्तुत से प्रस्तुत की व्यंजना होने के कारण 'अन्योक्ति' है । सारांश यह है कि जहाँ जहाँ प्रबंधप्रस्तृत वर्णन में अध्यात्मपक्ष का कुछ प्रशें। भी व्यंग्य हो वहाँ समासोक्ति ही माननी चाहिए । जहाँ प्रथम पक्ष अर्थात् अभिधयार्थ में किसी भाव की व्यंजना नहीं है (जैसे मार्ग की कठिनता औौर म सिंहलगढ़ की दुर्गमता के वर्णन में) वहाँ तो वस्तुव्यंजना स्पष्ट ही है, क्योंकि वहाँ एक वस्तुरूप अर्थ से दूसरे वस्तुरूप अर्थ की ही व्यंजना है। । पर जहाँ किसी भाव