पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/६५

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( ४५ ) । की भी व्यंजना है वहाँ यह जिज्ञासा हो सकती है कि एक पक्ष की वस्तु दूसरे पक्ष की दूसरी को व्यंजित अथवा पक्ष वस्तु करती है एक का भाव दूसरे पक्ष के दूसरे भाव को व्यंजित करता है । विचार के लिये यह पद्य लीजिए- पिउ हिरदय महें भेंट न होई। को रे मिलाव, कहीं केहि रोई ॥ ये पद्मावती के वचन हैं जिनमें रतिभाव व्यंजक ‘विषाद' और 'औौत्सुक्य' की व्यंजना है । ये बचन जब भगवत्पक्ष में घटते हैं तब भी इन भावों की व्यंजना बनी रहती है । इस अवस्था में क्या हम कह सकते हैं कि प्रथम पक्ष में व्यंजित भाव दूसरे पक्ष में उसी भाव की व्यंजना करता है ? नहीं , क्योंकि व्यंजना अन्य अर्थ की। हुआा करती है, उसी अर्थ की नहीं । उक्त पद्य में भाव दोनों पक्षों में ही हैं। । था बन भिन्न होने से भाव अपर (अर्थात् अन्य औौर समान, समानता अपरता में ही होती है) नहीं हो सकता। प्रेम चाहे मनुष्य के प्रति हो चाहे ईश्वर के प्रति, दोनों पक्षों में प्रेम ही रहेगा। अतः यहाँ वस्तु से वस्तु ही व्यंग्य है और भावव्यंजना का विधान दोनों पक्षों में अलग अलग माना जायगा। पहले तो पद्मावती और रत्नसेन के पक्ष में वाच्यार्थ की प्रतीति के साथ ही असंलक्ष्यक्रम व्यंग्य द्वारा उन दो भावों (विषाद और श्रौत्सुक्य) की प्रतीति होती है । इसके उपरांत हम फिर प्रथम पक्ष के वाच्यार्थ से चलकर लक्ष्यक्रम व्यंग्य द्वारा दूसरे पक्ष की इस वस्तु पर पहुँचते हैं-‘ईश्वर तो अंतःकरण में ही है, पर साक्षात्कार नहीं होता । किस गुरु से कहें जो उपदेश देकर मिलाबे ।’ इसमें अन्य आाश्रय और अन्य नालंबन का ग्रहण है अतः यह वस्तुव्यंजना हुई। इस प्रकार दूसरे पक्ष की व्यंग्य वस्तु पर पहुँचकर हम चट उसके व्यंग्य भाव (ईश्वरप्रेम) पर पहुँच जाते हैं । मतलब यह है कि एक पक्ष से दूसरे पक्ष पर हम वस्तुव्यंजना द्वारा ही आाते हैं । यह वस्तुव्यंजना अधिकतर अर्थशत्युद्भव ही है, शब्दशबत्युद्भव नहीं—अर्थात् अर्थ के सादृश्य से ही लक्ष्यक्रम व्यंग्य जायसी में मिलता है, श्लेष के सहारे पर नहीं । कहीं एक प्राध जगह ऐसे उदाहरण मिलते हैं जिनमें शब्द के दोहरे अर्थ से कुछ काम लिया गया है जैसे-- जो यहि खीर समुद महप, । जीव रॉवाइ हंस होइ तरे ॥ यहाँ 'हंस' शब्द का पक्षी भी अर्थ है और उपाधिमुक्त शुद्ध आत्मा भी। जैसा कि कह झाए हैं, भगवत्पक्ष में घटनेवाले व्यंग्यार्थगर्भ वाक्य बीच बीच में बहुत से हैं । होरामन तोते के मु से पद्मिनी का रूपवर्णन सुन राजा उसके ध्यान में बेसुध हो गया। पर राजा केवल संसार के देखने में बेसुध था । अपने ध्यान की गंभीरता में, समाधि की अवस्था में, उसे उस समय परम ज्योति के सामीप्य की आानंदमयी अनुभूति हो रही थी जिसके भग होने का दुःख वह सचेत होने पर प्रकट करता है थावत जग बालक जस रोवा । उठा रोइ ‘हा ज्ञान सो खोवा' ॥ हों तो महा अमरपुर जहाँ । इहाँ मरनपुर आाएछ कहाँ ? केइ उपकार मरन कर कीन्हा। सकति हूँकारि जीउ हरि लीन्हा ॥