पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/७५

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( ५५ ) भागे चले बहरि रघुराया। ऋष्यमूक पर्वत नियराया ॥ तह रह सचिव सहित सुग्रीवा। श्रावत देखि अतुल बल सीवा ॥ प्रति सभीत कह सन हनमाना। प्ररुप जगल बल रूप निधाना । धरि बटुरूप देख हॉआजाई । कहेसि जानि जिय सैन बुझाई । । हितोपदेश, कथासरित्सागरसिंहासन बत्तीसी, बैंताल पच्चीसी नादि की कहानियाँ इतिवृत्त रूप में ही हैं, इसी से उन्हें कोई काव्य नहीं कहता । ऐसी कहानियों से भी श्रोता या पाठक का मनोरंजन होता है पर वह काव्य के मनोरंजन से भिन्न होता है। रसात्मक वाक्यों में मनुष्य के हृदय को वृत्तियाँ लोन होती। हैं। और इतिवृत्त से उसको जिज्ञासावृत्ति तुष्ट होतो है। तब क्या हश्र ?' इस वाक्य द्वारा श्रोता अपनी जिज्ञासा प्राय: प्रकट करते हैं । इससे प्रत्यक्ष है कि जो कहा गया है उसमें कुछ देर के लिये भी श्रोता का हृदय रमा नहीं है, आगे की बात जानने को उत्कंठा ही म ज्य है। । कोरी कहानियों में मनोरंजन इसो कुतूहलपूर्ण जिज्ञासा के रूप में होता है। उनके द्वारा हृदय को वृत्तियों (रति, शोक आदि) का व्यायाम नहीं होता,; जिज्ञासावृत्ति का व्यायाम होता है। उनका प्रधान गुण घटनावैचिट्य द्वारा कुतूहल को बनाए रखना ही होता है। कहो जानेवालो कहानियाँ अधिकतर ऐसी ही होती हैं। पर कुछ कहानियाँ ऐसो भो जनसाधारण के बोच प्रचलित होती हैं जिनके बोच बीच में भावोवा करनेवालो दशाएँ भो पड़तो चलती हैं। इन्हें हम रसात्मक कहानियाँ कह सकते हैं । इनमें भावुकता का अंश बहुत कुछ होता है और ये नपढ़ जनता के वोच प्रबंधकाव्य का ही काम देती हैं । इनमें जहाँ जहाँ मार्मिक स्थल जाते हैं वहाँ बहाँ कथोपकथन प्रादि के रूप में कुछ पद्य या गाना. रहता है। ऐसी रसात्मक कहानियों का घटनाचक्र ही ऐसा होता है जिसके भीतर सुख दु:खपूर्ण जीवनद शास्त्रों का बहुत कुछ समावेश रहता है । पहले कहा जा चुका है

िपद्मिनी और होरामन तोते को कहानो ’ इसी प्रकार को है । इसके घटनाचक्र के

भीतर प्रेमवियोगमाता की ममतायात्रा का कष्ट, विपत्ति, प्रानंदोत्सव, युद्ध जयपराजय आदि के साथ साथ विश्वासघातवैरछल, स्वामिभक्ति , पातिव्रत, वीरता प्रादि का भी विधान है । पर ‘पद्मावत’ शृंगारप्रधान काव्य है । इसो से इसके घटनाचक्र के भोतर जीवनदशाओं और मानव संबंधों को वह अनेकरूपता नहीं है जो रामचरितमानस में है । इसमें रामायण की अपेक्षा बहुत कम मानव दशाों और संबंधों का रसपूर्ण प्रदर्शन और बहुत कम प्रकार के चरित्रों का समावेश है । इसका मुख्य कारण यह है कि जायसो का लक्ष्य प्रेमपथ का निरूपण है । जो कुछ हो, यह अवश्य मानना पड़ता है कि रसात्मकता के संचार के लिये प्रबंधकाव्य का जैसा घटनाचक्र चाहिए पद्मावत का वैसा ही है । चाहे इसमें अधिक जीवन- दशाों को अंतर्भुत करनेवाला विस्तार और व्यापकत्व न हो, पर इसका स्वरूप बहुत ठीक है ।