पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/७६

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( ५६ ) संबंनिर्वाह प्रबंधकाव्य में बड़ी भारी बात है संबंधनिर्वाह । माघ ने कहा है " बढपि स्वेच्छया काम प्रकीर्णमभिधीयते । अनुज्झितार्थसम्बन्धः प्रबन्धो दुरुदाहरः ॥ जायसी का संबंधनिर्वाह अच्छा है। एक प्रसंग से दूसरे प्रसंग की श्रृंखला बराबर लगी हुई है । । कथाप्रवाह खंडित नहीं है ‘रामचंद्रिका’ जैसा केशव की का है, जो अभिनय के लिये बने हुए फटकर पद्यों का संग्रह सी जान पड़ती है जायसी में विराम अवश्य हैं-—जो कहीं कहीं अनावश्यक हैं-का पर विवरण लोप नहीं है। जिससे प्रवाह खंडित होता । है । हमारे प्राचार्यों ने कथावस्तु दो प्रकार की कही है-नाधिकारिक पृौर प्रासं गिकता। संबंधनिबह पहले यह चाहिए अतः पर विचार करते समय सबसे तो देखना प्रासंगिक कथाओं का जोड़ आधिकारिक वस्त अच्छी तरह मिला के साथ हुआा है या नहीं अर्थात् उनका आधिकारिक वस्तु के साथ ऐसा संबंध जिससे उसकी गति में क्य सहायता पहुँचती हो। जो बत्तांत इस प्रकार संबद्ध न है या नहीं होंगे वे ऊपर से व्यर्थ ठस हए मालम होंगे चाहे उनमें कितनी ही अधिक रसात्मकता हो। ‘हितोपदेश' में एक कथा के भीतर कोई जो दूसरी कथा कहने लगता है या अलफलला' में एक कहानी के भीतर का कोई पात्र जो दूसरी कहानी छेड़ बैठता है। वह मुख्य कथाप्रवाह से संबद्ध नहीं कही जा सकती । पद्मावती में कई प्रासागक वृत्त हैं-जैसे हीरामन तोता ब्राह्मण का हालबादल का प्रसंग-जिनका नाधिकारिक वस्तु के प्रवाह पर पूरा प्रभाव खरीदनेवाला वृत्तांत, राघव चेतन का उनके कारण आधिकारिक का बहत हुमा वस्तुठात गिक वस्तु ऐसी ही होनी चाहिए जो आाधिकारिक वस्तु को गति प्रागे बढ़ाती या किसी मार्ग कुछ निर्धारित है । प्राएं शोर मोड़ती हो, जैसे देवपाल के वृत्त ने अलाउद्दीन के फिर चित्तौर पहुँचने के पहल ही रत्नसेन के जीवन का अंत कर दिया । यह तो हुई प्रासंगिक कथा अतिरिक्त अन्य वक्त है। की बात जिसमें प्रधान नायक के किसी। का रहता । अब प्राधिकारिक वस्तु की योजना पर ग्राइए । सबसे पहले तो यह प्रश्न उठता है कि प्रबंधकाव्य में क्या जीवन चरित के समान उन सब बातों का विवरण होना चाहिए जो नायक के जीवन में हुई हों । संस्कृत के प्रबंधन काव्यों को देखने से पता चलता है कि कुछ में तो इस प्रकार का विवरण होता है और कुछ में नहीं, कुछ की दृष्टि तो व्यक्ति पर होती है औौर कुछ की किसी प्रधान घटना पर । जिनको दष्टि व्यक्ति पर होती है उनमें नायक के जीवन को सारी मुख्य घट नाओं का वर्णन-—गौरवद्धि या गौरवरक्षा के ध्यान से अवश्य कहीं कहीं कुछ उलटफेर के साथ-—होता है । जिनको दष्टि किसी मख्य घटना पर होती है उनका । सारा वस्तुविन्यास उस घटना के उपक्रम के रूप में होता है । प्रथम प्रकार के प्रबंधों को हम व्यक्तिप्रधान कह सकते हैं जिसके अंतर्गत रघुवंश, बुद्धचरित, विक्रमांकदेव- चरित नादि हैं । दूसरे प्रकार के घटनाप्रधान प्रबंधों के अंतर्गत कुमारसंभवकिराता