पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/७९

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( ५९ ) विवरण जोड़े गए हैं -—जैसे पदमावती के प्रथम समागम के अवसर पर सोलह गारों श्रौर बारह ग्राभरणों के नामसिहलद्वीप से रत्नसेन औौर पदमावती की यात्रा के समय फलित ज्योतिष के यात्राविचार की पूरी उद्धरणीराघव का बादशाह के सामने पद्मिनी, चित्रणी नादि स्त्रीभेद कथन । कई स्थलों पर तो गढ़ बानो' का दम भरनेवाले प्रॉपंथियों के अनकरण पर कुछ पारिभाषिक शब्दों से ढंकी हुई थिगलियाँ व्यर्थ जाड़ो जान पड़ती हैं, जैसे विवाह के समय भोजन के अवसर पर बाजा न बजने पर यह कथोपकथन-- तुम डित जानह सब भद्र । पहिले नाद भएऊँ तब वेदु ॥ ग्रादि पिता जो विधि अवतारा । नाद संग कि ज्ञान विचारा नाद, वेद मदपैड़ जो चारी । काया मां ते लेह विचारों ॥ नाद हिये मद उपन काया । जह मद तहाँ पैड़ नहीं छाया ॥ अथवा प्रथम समागम के समय सखियों द्वारा पद्मावती के छिपाए जाने पर राज रत्नसेन का यह रसायनी प्रलाप का पूछहु तुम धातु, निछोही। जो गुरु कोन्ह Jतरपट मोही ॥ सिधि गुटिका शव मो सँग कहा। भएर्ड , सत हिये न रहा ॥ सोन रूप जासों दुख खोलीं। गए भरोस तहाँ का बोलीं है। जहूँ लोना बिरवा जाती। कहि के फंदेस आान को पातो ॥ के जो पार हरतार की । गंधक देखि बहि जिऊ दी । तुम जोरा के सुर मयंकू । पुनि बिछोहि सो लीन कलंकू ॥ इन उक्तियों में ‘सोन, ‘रूप, 'लोना, जोरा कै' आादि में श्लेष ऑौर मुद्रा का कुछ चमत्कार अवश्य है पर यह सारा कथन रस में सहायता पहुँचता नहीं जान पड़ता । कुछ समाधान यह कहकर किया जा सकता है कि राजा रत्नसेन जोगी होकर अनेक प्रकार के साधुओं का सत्संग कर चुका था इससे बिलध दशा में उसका यह पारिभाषिक प्रलाप व हत अनुचित नहीं। पर कवि ने इस दृष्टि से उसकी योजना नहीं है। पारिभाषिक शब्दों से भरे कुछ प्रसंग घुसेड़ने का जायसी की को शौक हो रहता है, जैसे पद्मावती के मुंह से ‘त लगि रंग न रॉचे जौ लगि होझ न चून' सुनते ही राजा रत्नसेन पानों की जातियाँ गिनाने लगता है हों तुम नेह पियर भा पानू । पेड हंत सनरास बखा ॥ सुनि तुम्हार संसार बड़ौना । जो लोन्ह, तन कोन्ह गड़ौना ॥ फरि फेरि तन कोन्ह भेंजौना । यौटि रकत रंग हिरदय औौना ॥ एकदेशप्रसिद्ध ऐसे शब्दों के प्रयोग से जो अप्रतोत्व' दोप आाता है वह इस अनावश्यक विराम के बीच औौर भी खटकता है । कहीं कहीं तो जाथसो कोई शब्द पकड़ लेते हैं प्रौर उसपर यों ही बिना प्रसंग के उधितयाँ बाँध चलते हैं-जैसे - बादशाह की दावत के प्रकरण में पानी का जिक्र आाया कि पानो' को ही लेकर वे यह ज्ञानचर्चा छेड़ चले पानी मूल परख जौ कोई । पानी बिना सवाद न होई ॥ अमृतपान यह अमृत माना। पानी साँ घट रहे प राना ॥