पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/८१

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है
( ६१ )

( ६१ ) तिक परिस्थिति का कैसा सूक्ष्म विवग्रहण कराता हुआा कवि चला है । चलने में मार्ग के स्वरूप को ही देखिए कवि ने कसा प्रत्यक्ष किया है। तस्याः खुरन्यासपवित्रपांसुमपांसुलानां धुरि कीर्तनीया । माग मनुष्येश्वरधर्मपत्नी श्रतरिवार्थ’ स्मतिरन्वगच्छ 'गाय के पीछे पीछे पगडंडी पर सूदक्षिणा चली' इतना ही तो इतिवृत्त है, पर जिसकी धल पर नंदिनी के खुर के चिह्न पड़ते चलते हैं यह विशेषण वाक्य देकर कवि ने उस मार्ग का चित्र भी खड़ा कर दिया है । वस्तुओों की ऐसी संश्लिष्ट योजना द्वारा बिवग्रहण कराने कार—वस्तुओं का अलग अलग नाम लेकर अर्थग्रहण मात्र कराने का नहीं-—प्रयत्न हिंदी कवियों में बहुत ही कम दिखाई पड़ता है। अतः जायसी में भी हम इसका श्राभास बहत कम पाते हैं । इन्होंने जहाँ जहाँ वस्तु वर्णन किया है वहाँ वहाँ भाषाकवियों को पृथक् पृथक् बस्तुपरिगणनवाली शैली ही पर अधिकतर किया है। । अतः ये बर्णन परपरा युक्त ही कहे जा सकते हैं । केवल वस्तुपरिणगन में नवीनता कहाँ तक जा सकती है। ?ऋतु का वर्णन होगा तो उस ऋतु में फलने फूलनेवाले पेड़ पौधों और दिखाई पड़नेवाले पक्षियों के नाम होंगे, वन का वर्णन होगा तो कुछ इने गिने जंगली पेड़ों के नाम ना , नगर या हाट का वर्णन होगा तो बाग बगीचोंमकानों और दुकानों का उल्लेख होगा। नवीनता की संभावना तो कवि के निज परीक्षण द्वारा प्रत्यक्ष को हुई वस्तुओं और व्यापारों की संश्लिष्ट योजना में ही हो सकती है । सामनी नई नहीं होती, उसकी योजना नए रूप में होती है । । ऊपर लिखी बात का ध्यान रखते हए भी यह मानना पड़ता है कि वस्तुबर्णन के लिये जायसी ने घटनाचक्र के बीच उपयुक्त स्थलों को चुना है और उनका विस्तृत वर्णन अधिकतर भाषाकवियों की पद्धति पर होते हुए भी बहुत ही भावपूर्ण हैं। अब संक्षेप में कुछ मुख्य स्थलों का उल्लेख किया जाता है जिन्हें वर्णन विस्तार के लिये सिंहलद्वीप वर्णन-—इसमें बगीचों, सरोवरोंकुओंबावलियों, पक्षियों, नगर हाट, गढ़, राजद्वार और हाथी घोड़ों का वर्णन है । । अमराई की शीतलता औौर सघनता का अंदाज इस वर्णन से कीजिए घन अम राउ लाग चहें पासा । उठा भूमि हृत लागि अकासा ॥ तरिबर सओ मलयगिरिं लाई । भइ जग , रेनि होड़ माई ॥ मलय समीर सोहावनि छाँहा । जेठ जाड़ लागे तेहि माहाँ ॥ ग्रोही छाँह रैन होइ प्रावै । हटियर सधे अकास देखावे ॥ पथिक जो पहुंचे सहिके घा । दुख बिसरे, सुख हो बिसरा ॥ इतना कहते कहते कवि का ध्यान ईश्वर के सामीप्य को भावना की ओर चला जाता है और वह उस अमर धाम की ओरजहाँ पहुँचने पर भवताप से निवृत्ति हो जाती है, इस प्रकार संकेत करता है जेइ पाई वह छह अनूपा। फिरि नहि आइ सहै यह धूपा ॥ जाय ने चना