पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/८५

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( ६५ ) साजा राजा, बाजन बाजे । मदन सहाय दुवी दर गाजे ॥ नौ राता सोने रथ साजा । भए बरात गोहने सब राजा ॥ घर घर बंदन रचे द्वारा । जावत नगर गोत झनकारा ॥ हाट बाट सब सिंघलजहूँ देख्हें ततें रात । धनि रानी पदमावती, जेहि ऐति बरात ॥ बरात निकलने के समय अटारियों पर दूल्हा देखने की उत्कंठा से भरी स्त्रियों का जमावड़ा भारतवर्ष का एक बहुत पुराना दृश्य है । ऐसे दृश्यों को रखना जायसी नहीं भूलतेयह पहले कहा जा चुका है । पद्मावती अपनी सखियों को लेकर बर देखने की उत्कंटा से कोठे पर चढ़ती है पद्मावति धौराहर चढ़ी। दहें कस रवि जेहि कहें ससि गढ़ी । देखि बरात सखिन्ह स कहा । इन्ह महें सो जोगी कहें महा ? ॥ सखियाँ उंगली से दिखाती हैं कि वह देखो जस रवि, देखउठे परभाता । उठा छत्न तस बीच बराता। ॥ औोहि माँ भा दुलह सोई। औौर बरात संग सब कोई ॥ इस कथन में कवि ने निपुणता यह दिखाई है कि सखी उस बरात के बीच पहले सबसे अंधिक लक्षित होनेवाली वस्तु खून की घोर संकेत करती है; फिर कहती. है कि उसके नीचे वह जोगी दूल्हा बना बैठा है। भोज के वर्णन में व्यंजनों और पकावानों की नामावली है । गोस्वामी तुलसीदास जी ने राम सीता के विवाह का जितना विस्तृत वर्णन किया है उतना विस्तृत वर्णन जायसी का नहीं है । गोस्वामी जी का रामचरितमानस लोकपप्रधान काव्य है औौर जायसी के पद्मावत' में व्यक्तिगत प्रेमसाधना का पक्ष 'है। अतः पदमावत' में लोकव्यवहार का जो इतना चित्रण मिलता है उसी थ बहुत समझना चाहिए। जैसा पहले कह झाए हैं, इश्क की मसनवियों के समान । यह लोकपक्षशून्य नहीं है । -यात्रावर्णन सेना की चढ़ाई का वर्णन बड़ी धूमधाम का है। ग्रंथारंभ में शेरशाह की सेना के प्रसंग की चौपाइयाँ ही देखिएकितनी प्रभावपूर्ण हैं हय गय सन चल जग पूरी। परबत टू टि मिलह होइ री ॥ रेनु रंनि होइ रविह गरासा। मानुख पंखि लेहि फिरि बासा ॥ भुईं उड़ि अंतरिक्ख मृदमंडा । खंड खंड धरती बरम्हंडा ॥ डोलै गगन, इंद्र डरिSकाँपा । बासुकि जाइ पताह चाँपा ॥ मेरु धसमस, समुद्र सुखाई । बनखंड टूटि खेह मिलि जाई ॥ अगिलन्ह कहें पानी लेइ बाँटा । पलिछन्ह कहूँ नहि काँदौ ऑाँटा ॥ इसी ढंग का चित्तौर पर अलाउद्दीन की चढ़ाई का बड़ा विस्तृत वर्णन है बादसाह हठि कीन्ह पयाना । इंद्र भंडार डोल भय माना ॥ नब्बे लाख सवार जो चढ़ा । जो देखा सो सोने मढ़ा ॥