पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/९४

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७४ C कौन सो दिन जब पिउ मिल, यह मन राता जासु । वह दुख देबें मोर सबहौं दुख देख ता1 दोहे में अभिलाषका कैसा सच्चा प्रकृत स्वरूप है । प्रेम प्रेम चाहता है । इसी अभिलाष के अंतर्गत अपना दुख प्रिय के सामने रखने, ऑौर प्रिय भी मेरे विरह में दुखी है, इस बात का निश्चय प्राप्त करने की उत्कठा प्रेमी को होती है। रतिभाव के संचारी के रूप में 'माशा' या विश्वासकी बड़ी सुंदर व्यंजन जायसी ने पद्मावती के म्“से । ह कराई है । देवपाल को दूतो के यह कहने पर कि कस तृइ, बारि, हसि कुंभिलानी ?' पद्मावती कहतो तौ ल रहीं झरानी ज लहि भाव सो कंत । एहि फूलएहि सेंचुर होझ सो उठे बसंत ॥ इसी फूल शरीर) से जिसे तुम इतना कुंभलाया हुग्रा कहती हो । ऑौर इसी सिंदूर को फौको रेखा से जो रूखे सिर में दिखाई पड़ती है फिर बसंत का विकास गौर हो सकता है, यदि पति या जाय । इस बात का ध्यान रखना चाहिए उत्सव कि होली के उत्सव के लिये जायसी ने अबोर के स्थान पर बराबर सिंदूर का व्यवहार किया है । । संभव है, उस समय सिंदूर से ही अबीर बनाया जाता रहा हो । । श्रृंगार के संचारी वितर्क' का एक उदाहरणजो नया नहीं कहा जा सकता, लीजिए। बादल की नवागता वध युद्ध के लिये जाने को तैयार पति की जोर देख रही है औौर खड़ी खड़ी सोचती है- रहीं लजाइ तो पिउ चलेकहीं तो कह मोहि ढीठ । 'वत्सल्य’ के उदगार दो स्थानों पर हैं । एक तो वहाँ जहाँ राजा रत्नसेन जोगी होकर घर से निकलने को तैयार होता है; फिर वहाँ जहाँ बादल रत्नसेन को छुड़ाने की प्रतिज्ञा करने के उपरांत युद्वयात्रा के लिये चलने को उद्यत होता है । दोनों स्थानों पर ठजना माता के मुख से है पर विस्तीर्ण ऑौर गंभीर नहीं है, साधारण है । परिस्थिति के अनुसार रत्नसेन की माता का वात्सल्य सुख के अति वय' के द्वारा व्यक्त होता है औौर बादल को माता का शंका' संचारी द्वारा । रत्नसेन की माता कहतो। है व दिन रहेह करत तुम भो। सो कैसे साधत्र तप जोग । कैसे धु सहव बिनु छाहाँ । कैसे नींद परिहि भॐ माहाँ ॥ से चलब श्रोढ़व कारि कथा ? से पाँव तुम पंथा । कैसे सहब खनहि खन भखा ? कैसे खाब कुरकुटा रूखा ॥ जितना दु:ख घरों के दुःख को देख सुनकर होता है उतना दुःख प्रिय व्यक्ति के सुख के अनिश्चय मात्र से होता है । । यह निश्चय प्रिय व्यक्ति के ग्राँख से प्रोझल होते ही उत्पन्न होने लगता है । तुलसी औौर सूर ने कौशल्या औौर यशोदा के मुख से ऐसे अनिश्चय की बड़ी सुंदर व्यंजना कराई है । । ऐसे स्थलों पर इस निश्चय का कारण रतिभाव ही होता है। अतः जिस प्रकार शंका रतिभाव का संचारी होती है। उसी प्रकार यह ‘अनिश्चय' भी। परिस्थितिभेद से कहीं संचारी केवल ‘अनिश्चय तक रहता है और कहीं ‘शंका' तक पहुँचता है । छोटी अवस्था का बादल जिस स