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पृष्ठ:ज्ञानकोश भाग 1.pdf/१४२

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अतर
अतर
ज्ञानकोष (अ) १२९

से ६७२५ टन अर्थात् ४ लाख रुपयोंका कच्चा माल विदेश भेजा गया था।

देहली, लाहौर, अमृतसर, लखनऊ, जौनपुर कन्नौजमे इत्रका अबभी बहुत व्यापार होता है। कच्चा माल बम्बईसे बाहरके देशों भेजा जाता हैं। निम्न- लिखित पदार्थोंसे बहुधा इत्र अथवा सुगन्धित तेल तय्यार किया जाता है। बेलाके फूल, धूप, शिलारस, कुलञ्न इलायची,अगरू,मूगफली,दालचीनी, संतरे का फूल अथवा छिलका, खटुआ, जूही, चमेली, जई का फूल; सोनचम्पा, केवड़ा कस्तूरी, जटामासी, पानडी, गुलाब, चन्दन, खस, लोबान, नागरमोथा, दौना, मरवा, मौलसरी इत्यादि।

यदि केवल कच्चा माल ही देशसे जाता तो भी उतना नुकसान न होता किन्तु वहीं फिर इत्र तथा सतोंके रूपमें आकर विकता है जिससे बड़ी हानि होती है। इन्हीं विदेशी इत्रोंके कारण कन्नौज इत्यादिके बहुतसे कारखाने बन्द होते जा रहे हैं। क्योंकि इन्हीं तीव्र सतों(Concentrated essence) से सुगन्धित तेल बनाने की प्रथा बहुत बढ़ गई है क्योंकि इसमें सरलता बहुतहोती है और व्ययभी कम पड़ता है। यद्यपि ये मिश्रण नियम पूर्वक बनाये हुए असली तेलके मुकाबले में कुछभी लाभकारी नहीं होते, न उनकी सुगन्ध ही स्थायी होती है तोभी खपत उन्हीं सतोंद्वारा बनाये हुए तेलोंकी ही बहुत अधिक होती है। जर्मनसे, जिस समय युरोपीय महासमर आरम्भ हुआ था, उस समय इन विलयती सतों का आना बन्द होगया था जिस से एक बेर कन्नौज इत्यादिके कारखाने फिरसे चालू होगये हैं। कन्नौज, जौनपुर तथा गाजीपुर अपने सुगन्धित तेल तथा अतरके लिये सारे भारतवर्ष में प्रसिद्ध है। देशी रीतियाँ तेल बनाने की बड़ी ही सुगम है किन्तु भद्दी होने के कारण विदेशी मालोंके सामने नष्टप्राय होती जारही हैं।

कृति ने०१―सफेद तिल भली भाँति धोकर सुखा लेना चाहिये। थोड़ी पिन्नी का हाथ लगाकर जिस वस्तुका तेल निकालना हो उसकी एक परत बिछाकर उसपर एक परत तिल बिछा देना चाहिये। इसी भांति एक परत तिल और एक परत मुख्य वस्तु की देते रहना चाहिये।फिर उसको ढककर १२ से १८ घण्टे तक रखदेना चाहिये। तदनन्तर कोल्हूसे तेल निकाल लेना चाहिये।

कृति नं॰२―अतर बनाने वाले गन्धी एक बड़े हण्डे में पानी भर कर उसमें फूल भरते हैं। उसके नीचे भट्टी जलाकर उसकी भाप उर्ध्व नलिका यन्त्रसे बाहर दूसरे वर्तनमें एकत्रित करते हैं।

वह फिर पानी हो जाता हैं और उसके ऊपर तेल सा पदार्थ तैरने लगता है। उसी को युक्तिसे एकत्रित किया जाता है। वही उत्तम अतर कहलाता है।

कृति नं॰३―जिन फूलों का इत्र बनाना हो उनको बोतल में भर कर तिल्ली का तेल इतना छोड़े कि फूल डूब जावे। उसमें इतना कसा काग लगाना चाहिये कि हवा भीतर प्रवेश न करसके। उसको महीना सवा महीना धूपमें रखना चाहिये। तदनन्तर उसमें नये फूल डालना चाहिये और पुराने निकाल कर फेंक देना चाहिये। इसी क्रियाको चार-पाँच बार करनेसे इत्र तयार हो जाता है।

गुलाब जल―गुलावके फूल और पानी एकमें मिला कर एक मटके में भर देना चाहिये। उस पर एक छोटा सा मटका औंधा करके गीली मट्टी से दोनोंका मुंह बन्द कर देना चाहिये। उस मटके में छेद करके एक उर्ध्वनलिका उसमें इस भाँति लगा देनी चाहिये कि भाप बाहर बिल्कुल न निकल सके। अर्थात् उस छेद पर गीली मट्टी पोत देनी चाहिये। नलीका मध्यभाग या तो शीतल जलमें डूबा रहना चाहिये या खूब गीला कपड़ा उस पर लपेटा रहना चाहिये। तब नलीके मुंह पर कोई बर्तन रख कर उस मटकेके नीचे आग सुलगा देनी चाहिये। अन्दरके जलकी भाप जब ठण्डके सहवाससे फिर पानी होकर दूसरे बर्तन में एकत्रित होगी तो वह अत्यन्त सुगंधियुक्त गुलाब जल हो जावेगा।

कृति नं॰२―ओटोडी रोज-॥- ड्राम,मग्नेशिया १ औंस, स्त्रवितजल (Distilled Water)-॥-गैलन। पहले ओटो डी रोज और मग्नेशियाको मिला लेना चाहिये। तदनन्तर पानी में उसे घोल कर ब्लाटिङ्ग-पेपर (सोख्ते) से उसे छान कर व्यवहार में लाना चाहिये।

अर्क संतरा―(ऑरेज वाटर) निरोली तेल ३० बूंद और २ ड्राम मग्नेशिया तीन पाय स्त्रवित जलमे डाल कर छान लेना चाहिये।

कोलन वाटर बनानेकी कृति―निरोलीके तेलकी २५ बूंद एसन्स आफ सिदरेट २५ बूंद एसंस आफ लेमन २५ बूंद, एसन्स आफ वर्गमोर २५ बूँद, एसन्स आफ रोजवेरी १/२ औंस, एसन्स आफ पुर्तगाल निरोली १/४ औंस पदार्थोंको एक गैलन अल्कहलमें भली भाँति मिला कर एक बोतलमें मिला कर आठ दिन रखना चाहिये।

लेवेण्डर वाटर बनानेकी कृति―उत्तम लेवेण्डर तेल २ ड्राम, लौंगका तेल १/४ ड्राम, कस्तुरी २॥ भेन,

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