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रही। किसी २ के मतानुसार बावेलोंने १९६६-१३२२ ई० तक राज्य किया । इसी बीच मूल-देव, बिसलदेव, भीमदेव, अर्जुनदेव. सारंगदेव और करण नामके ६ राजा हुए। १२६७ ई० में अलाउद्दीन के सेनापति अलफखाँने करण को पराजित किया, जिस पर वह देवगढ़ के राजा रामदेवकी शरण में गया । पर दुर्भाग्यने पीछा न छोड़ा सुल्तानने उसकी स्त्री देवलरानीको पकड़ कर हरमें रख लिया और बादमें उसकी पुत्रीको भी पकड़वा मँगाया और अपने पुत्रका व्याह उससे कर दिया । बाघेलवंश के साथ ही अन्हिलवाड़ राज्य तथा नगरका भी नाश हुआ । विग्जने 'गुजराष्ट्र' में लिखा है कि तेरहवीं शताब्दी के अन्त में हिल- वाड़को नष्ट कर अलाउद्दीनने उसके मन्दिरोंको मिट्टी में मिला दिया। शहर पर उसने गदहेका हल घुमाया, तब उसको शान्ति मिली। इसके पश्चात् अन्हिलवाड़का इतिहास वर्तमान पट्टन नगरका इतिहास है । श्रतः वह इतिहास पट्टन नामक शीर्षक के नीचे दिया जाता है । [ संदर्भग्रन्थ-वॉ. गॅ. हाँ. ७; कुमार पाल चरित, आइने अकबरी तथा अन्य ग्रंथ ] अन्होनी - यह गाँव हुशंगाबाद जिलेमें है, यहाँ पर एक गरम पानीका करना है । यह झरना महादेव पहाड़के ठीक उत्तर में है। इस पहाड़से धनवा तथा नर्मदा नदी अलग अलग होकर बहती हुई गई हैं। इस गरम पानी से शरीर परके फोड़े तथा त्वचाके रोग अच्छे होते हैं। इसी कारण यहाँ एक मेला लगता है। इस गाँव के आग्नेय दिशा की ओर १६ मीलकी दूरी पर एक दूसरा गरम पानीका भरना है । इसका नाम महाल झील है । इसका पानी इतना गरम है कि इसमें हाथ डालना भी मुश्किल होता है । [ वॉ० ० १८७० ५० ४] अपकृत्य ( Tort ) - यह कानून शास्त्रका एक पारिभाषिक शब्द है । 'अपत्य' उस कार्य को कह सकते हैं जिसके विरुद्ध सिविल कोर्ट में एक व्यक्तिको दूसरे व्यक्ति के विरुद्ध दावा करने का अधिकार तो हो, किन्तु यह अधिकार किसी पूर्वकृत इकरारनामे ( Ccntract) के भङ्ग करनेके आधार पर न हो। यह विधान इंगलैण्ड, उसके आधीन देशों तथा युनाइटेड स्टेटस आफ अमेरिका इत्यादि देशोंमें पाया जाता है। मुख्यतः उन देशों में जहाँ इङ्गलैण्डके कामन लॉ (Common Law) के भित्ति पर विधान रचे गये हैं, वहाँ |
इसका विकास अधिक देख पड़ता है। किसी भी कृत्यको 'कृत्य' के शीर्षके नीचे उनके लिये केवल यही आवश्यक नहीं है, कि केवल किसी नियमका उल्लघंन किया गया हो, किन्तु यह भी नितान्त आवश्यक है कि किसी भी व्यक्ति-विशेष को अपनी व्यक्तिगत हानिके लिये न्यायालय के सम्मुख वादी बनकर आनेका अधिकार भी प्राप्त हो । यदि किसी व्यक्तिको ऐसी हानि नहीं हुई है जो उसके व्यक्तित्व से सम्बन्ध रखती है किन्तु कार्यकर्ता नियमानुसार दण्डभागी हो भी सकता है तो भी वह 'अपत्य नहीं कहलायेगा । बहुधा आर्थिक दण्ड से ही अपकृत्यका उचित न्याय नहीं होता, अतः समानता-व्यवहार विधान ( Law of Equity ) भी व्यवहार में लाया जाता है । विवाह सम्बन्धी ( Matrimonial courts ) । अथवा सामुद्रिक ( Admirality ) न्यायालयों के अतिरिक्त 'कामन लॉ' न्यायालयों में आवश्यकतानुसार 'श्रपकृत्य' का दावा किया जा सकता है । सभ्य राष्ट्र के प्रत्येक मनुष्यको यह अधिकार होता है कि वह अपने शरीर, संपत्ति तथा सम्मान की रक्षा करें, उसका यह भी कर्तव्य होता है कि वह अपने उन कार्यको अत्यन्त सावधानीसे करे, जिनसे दूसरोंको किसी भी प्रकार की हानि पहुँचने की संभावना हो । यदि किसीने जान-बूझ कर अथवा अनजानमें किसीको हानि पहुँचाई, तो उसे न्यायालय में अपने कार्यके औचित्यका समर्थन करना पड़ता है और यदि न कर सका तो दंड भोगना पड़ता है। ऐसे समय यह प्रश्न नहीं उठता कि उसका अपराध किस नियम के अनु सार सिद्ध होता है । अपकृत्य विधानका सबसे अधिक उपयोग स्वामी ( Employer ) तथा सेवकों (Employee) के झगड़ों में हुआ है ! प्रत्येक स्वामी ( Employer ) अपने कर्मचारियों के लिये उत्तरदायी होता है। यदि कर्मचारी द्वारा किसी व्यक्तिको क्षति पहुँचती है तो उसके लिये स्वामी पर दावा किया जा सकता है । परंतु स्वामी अपने कर्मचारियोंके कार्योंका उत्तरदायी उसी समय तक रहता है, जब तक वह उसका, उसकी आज्ञानुसार कार्य करता है। इससे एक लाभ यह हुआ है कि अब प्रत्येक व्यक्ति क्षति पहुँचाने वाले कर्मचारीके स्वामीको प्रतिवादी बना सकता है, परन्तु यदि एक हो कार्यालयके एक कर्मचारीको दूसरेसे क्षति पहुँचती है तो उसके लिये स्वामी उत्तरदायी नहीं होता, यदि वह क्षति किसी ऐसे कारणसे नहीं हुई, जिसका सम्बन्ध |
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अन्होनी
अपकृत्य
ज्ञानकोश ( ) २५३