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पृष्ठ:ज्ञानकोश भाग 1.pdf/२८१

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अपराजिता
अपस्मार
ज्ञानकोश( अ ) २५८

गई हैं, बल्कि इनमें उन कथाओ का वर्णन रहता है जिनमें प्रचलित तत्व तथा विचार धाराओंका समावेश रहता है। अनेक अवदानोंमें 'अहंत' के चरित्र वर्णित हैं। सबसे बड़े 'महावस्तु व दान' में बुद्ध के पूर्वजन्मोंका ब्योरा दिया हुआ है ।

[ सन्दर्भ ग्रंथ -- थेरीगाथा, सूलर-दी प्रोसिडिङ्ग श्राफ श्रोरिण्ट कांग्रेस ट जिनेवा, गन्धवंश, श्रवदान शतक, दिव्यावदान, प्रोल्डेनवर्ग-कॅडलोग श्राफ पाली मैनुस्क्रिप्ट ( इण्डिया अफिस लाइब्रेरी ), सुमंगल-विला- सिनी (होल डेविस तथा कार्पेन्टर ), महावस्तु (सेनार्ट ) ]

अपराजिता- इस बनस्पतिको संस्कृत भाषा 'विक्रान्ता' कहते हैं । इसका पौधा बिल्कुल छोटा होता है। यह पृथ्वी पर लताकी भाँति फैल जाता है, किन्तु इसका विस्तार अधिक दूर तक नहीं होता ! इसके पत्ते बारीक, लम्बे तथा पाण्डु रङ्गके होते हैं। फूल इसका गहरा लाल होता है, कुछ २ नील वर्णका समावेश रहता है। इसका विशेष उपयोग औषधिही होता है। कँवल (पीलिया) रोग में इसकी जड़ छाँछके साथ पिलाई जाती है | बवासीर के रोगीको इसकी जड़ का रस घोके साथ मिलाकर देते हैं । -

अपरादित्य - ( प्रथम ) यह कोकनका शिला- हार वंशीय राजा था । उरणके समीप ११३८ ई० ( शक २०६० ) का जो शिलालेख मिला था. इसमें इसका उल्लेख मिलता है। काश्मीरके मखोके tricate डा० हर को जिस परादित्य का वर्णन मिला है, कदाचित् वह यहीं श्रपरादित्य है। इस पुस्तकका समय, डा० बुल्हरके बिचार · से, १९३५- ११४५ ई० तकका हो सकता है । जिस परादित्यका उल्लेख श्रीकंठचरित्र में आया है उसने सोपारा (सुर्पारका ) से तेजकंठ नामक पंडित को अपने देशका प्रतिनिधि नियत कर कश्मीर के परिsatकी सभा में भेजा था। यह पण्डितों की सभा काश्मीर के राजा जयसिंह ( १९२६-११५० ई० ) के समय में हुई थी ।

[ संदर्भ ग्रंथ -- वॉ० ब्राँ० ० ए० सो० विशेष अंक २१८७७ ० ० ० पा०२]

अपरादित्य- (द्वितीय) यह भी कोकनके शिलाहार वंशका दूसरा राजा हो गया है। उस - ओरके भूमिदान-सम्बन्धी पाँच शिला लेख उपलब्ध हैं । उनमेंले भिवडी ताल्लुकेका प्राप्त : शिला-लेख १९८४ ई० (१९०६ शक ) का है, परल मैं जो शिलालेख मिला है, सम्भवतः वह ११८७ई० (१९०६ शक) का है। वसई ताल्लुकेमें प्राप्त दो "शिलालेखोंमें से एकका तो समय ११८५ ई००

निश्चित है, किन्तु दूसरेका समय दिया हुआ हीं नहीं है। इन्हीं शिलालेखोंमें १२०३ ई० के भाण्डवी के समीप मिले हुए केशीदेवके शिलालेख में अप- किका वर्णन आया है। कदाचित यह वही अपरोक होगा। केशीदेव अपकिका पुत्र था । यशवलक स्मृतिके मिताक्षर विधान पर को गई जो अपक टीका है, उसका कर्त्ता यही अपरा दित्य था । इस टीकाके अन्तमें इसका उल्लेख आया है जिससे यह विदित होता है कि वह शिलाहार घरानेका राजा था और १२वीं शताब्दी के आरम्भमें हुआ होगा । ११=७ ई० के परल में मिले हुए शिलालेख से पता चलता है कि यह उस समय अवश्य रहा होगा, क्यों कि उस लेख में अपरादित्य ने अपने को महाराजाधिराज तथा कोकनका चक्रवर्ती कह कर उल्लेख किया है। अतः ऐसा अनुमान किया जा सकता है कि पश्चिमीय चालुक्य वंशके नाशके पश्चात् जब सब ओर निरंकुशताका डंका बज रहा था, उसी समयको स्थिति से लाभ उठा कर अन्य सामन्तोंके सदृश यह अपरादित्य भी स्वतन्त्र हो गया होगा।

[ सन्दर्भग्रन्थ-याँ० ग० हा ०१ पा० २ ० रा० ए० सो० ज० पु० १२ तथा विशेषाङ्क इ० अ० ९]

अपरान्तक - (अपरस्तिका)अपरान्तिका पश्चिमीय प्रांत अथवा सरहद पर रहने वाली जातियों में से यह भी एक प्रसिद्ध जाति थी । इसका 'अपरान्त्य' नामसे भी उल्लेख होता है । नासिक में प्र शिलालेखों में से एक में इसका उल्लेख आया है‌। किन्तु यह स्पष्ट पता नहीं लगता कि यह शब्द किसी प्रदेश विशेषके लिये व्यवहार किया गया है। अथवा वहाँ के निवासियोंके लिये । इसका उल्लेख रुद्रदामनके जूनागढ़ के मिले हुए शिला लेखमें भी मिलता है ।

अशोक द्वारा शासित जातियों में यवन, कम्बोज इत्यादिके साथ इनका भी उल्लेख आता है । पं० भगबान लालजी का कथन है कि ठाना जिलेका सोपारा नामक जो गाँव है, वह अपरान्त- प्रदेश अथवा जातिका एक मुख्य स्थान रहा है । -

अपस्मार —आयुर्वैदिक विवेचन - यह एक रोग है । हिस्टीरिया, मृगो इत्यादि इसीका रूपान्तर है । 'स्मृति भूतार्थ विज्ञान अपस्तत् परिवर्जनेः द्वारा इसकी परिभाषाकी गई है । अर्थात् जिस रोगमै स्मृतिका नाश हो जाता है, उसे 'अपस्मार कहते हैं। जब मनुष्यका शरीर तथा मन किसी अन्य व्याधिके कारण मलीन तथा जर्जर हो जाता है, अनियमित आहार-विहार द्वारा शक्ति

अपस्मार