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इसमें विशेषता दिखाई पड़नेवाली बात यह है कि इसके सिरेके पास वर्धमान अग्र दिखाई पड़ता है। इस वर्धमान अग्रके पास एक टेंगुरीके समान फूलता है और वह अलग बढ़ता है और उससे शाखा तैयार होती है। असंयोगिक उत्पादनमें सिरे के पास की पेशी में बहुत जननपेशियाँ उत्पन्न होती हैं और उनमें भी बालके समान दो दो तन्तु होते हैं। इन जनन पेशियोंके बाहर होने पर उनसे नयी वहस्पति तैयार होती है इस का योगसंभव उत्पादन ऊर्णिकाके समान ही समान तत्वोंके संयोगसे होता है। समुद्र में मिलने वाली कुछ जातियों की पेशियों पर चूने के पुट बैठे रहते हैं और इस कारण वे बहुधा मूँगेके समान देख हैं। इस प्रकारकी जातियोंमें योगसंभाव उत्पादन समान तत्वोंका न हो कर दो अच्छी तरह पहिचाने जाने वाले स्त्री तथा पुरुष तत्वोंके संयोगसे होता है। सायफोनेल (Siphonales) के भेदोंमेंकी वाचेरिया (Vaucheria) नामकी जाति मीठे पानी और आर्द्र जमीनपर मिलती है। उसमें जो जननपेशियां तैयार होती हैं वे दूसरोंके सदृश सव पेशियोंमें तैयार नहीं होती। केवल सिरेकी पेशियोंमें ही होती हैं। सबसे पहले सिरेकी पेशी फूलती है और फिर उसमें जननपेशी तैयार होती हैं। वह पेशी इतनी बड़ी होती हैं कि बिना किसी यन्त्रकी सहायतासे ही आँखसे देखी जा सकती है। इस जातिका योगसंभव उत्पादन भी भिन्न है। प्रथम पेशीमें दो ऊँचे भाग और उनके बीचमें पेशी कवच उत्पन्न होता है और फिर उस मूल पेशीसे वे भिन्न होते हैं। वे ऊँचे भाग फिर बढ़ते हैं और उनको दो पेशियाँ होती हैं। उन दोनोमें से एकमें बहुत से पुंस तत्व होते हैं और दूसरी में एकही स्त्री तत्व होता है। भीतर रहने वाली पेशीके मुखकी ओरकी त्वचा फूटकर उस पेशीमें स्त्रीतत्वके सासनेही एक खिड़कीके समान प्रशस्त जगह होती है। फिर पुंस्तत्वकी पेशी फटती है और उसमेंसे पुंस्तत्व बाहर गिरते हैं। और उनमेंका एक पुंस्तत्व खिड़कीके भीतर जाकर स्त्रीतत्वसे संयोगसे एक जननपेशी तैयार होती है और उसपर एक कवच आता है। इस पेशीसे फिर आगे एक नयी वनस्पति तैयार होती है। (१०) पिंगी (Phaeophyceae) सुंधनी रंगकी एक वनस्पति है। यह जाति हरित पाण केशकी तरह एक पेशीमय पुच्छविशिष्ट (Flagell- |
ata) से हुई होगी। इन वनस्पतियोंके शरीरोंकी रचना हरी वनस्पतियोंकी अपेक्षा किंचित् उच्चकोटिकी होती है। अपवादात्मक कुछ बनस्पतियोंको यदि छोड़ दिया जाय तो यह जाति खारे पानीमें मिलती है, ऐसा कहनेमें कोई हरजा नहीं है। समुद्रके अधिंक ठंडे पानीमें इन वनस्पियोंकी पूर्णावस्था प्राप्त होती है। इनमें की भिन्न भिन्न बनस्पतियोंके शरीरमें बहुत बैचित्र्य दिखलाई पड़ता है। सबसे सादे प्रकारकी वनस्पतियों के शरीर पेशियोंके एकके आगे एक रहने वाले तन्तुओंके होते हैं। किसी किसीमें डालियाँ निकलती हैं और किसी किसीमें नहीं निकलती। बहुतेरोका स्थाणु अनेक पेशियोंका नलीके समान पोला और गोल होता है। उसमें बहुत सी डालियाँ निकली रहती हैं। कुछका स्थाणु अनेक पेशीमय, चिपट्टा और फैला रहता है। इस प्रकार के दोनों विभागोंमें वृद्धि एक अग्रस्थित वर्धमान पेशी (Apical growing cell) से होती है। कुछ बनस्पतियाँ गोल भी होती हैं। पेशियोंमें बहुधा एक केन्द्र होता है। रंजित द्रव्य शरीर बहुधा गोल या टेढ़ा मेढ़ा होता है उसमें सुँधनी रंगका द्रव्य होता है और इसी कारण वनस्पतियाँ भी काले तपकिरी रंगकी होती हैं। अच्छी प्रकारसे पूर्णावस्थामें पहुँची हुई वनस्पतियोंकी शरीररचनामें बहुत सुधारणा दिखलाई पड़ती है। वाह्य पेशियोंकी वह सर्वदा वाह्य द्रव्योंका सामीकरण करती है। दो जातियोंमें चलनीके सदृश नलिकाकी तरह एक पेशीजाल देख पड़ता है और वह बहुधा औजसद्रव्य (Albumon) मिश्रित रसको बहाकर लेजानेका काम करता होगा। समुद्रमें रहने वाली जातियाँ आकारमें बहुत बड़ी होती हैं। उत्तर समुद्रमें मिलने वाली लामिनेरिया (Laminaria) नामकी वनस्पतीका आकार चिकने और फैले हुये पत्तेके सदृश रहता है। उसमें एक डण्ठल भी रहता है। यह पत्ता १० फीट लम्बा रहता है और उसका डण्ठल आधा इंचका मोटा रहता है। दक्षिण ध्रुव महासागरमें उगनेवाली ऐसी ही एक वनस्पति है। वह तहमें उगती है वहाँ एक जाल बनाती है और वहींसे उसकी शाखा ऊपर पृष्ट भागपर आकर फैलती हैं। ये शाखाँए २०० से लेकर २२५ फीट तक लम्बी होती है। दक्षिण ध्रुव महासागर की कई जातियाँ वृक्षके सदृश बढ़ती है। उनके तने मोटे होते है और बहुत ऊचें बढ़ते है। दूसरी कुछ जातियाँ इससे भी बड़ी होती हैं। इन सबके |
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अपुष्प बनस्पति
अपुष्प बनस्पति
ज्ञानकोश (अ) २७२