पृष्ठ:देव और बिहारी.djvu/११२

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देव और विहारी फहर-फहर होत पीतम को पीत पट , लहर-लहर होत प्यारी की लहरिया । देवजी के जितने ही अधिक उत्तम छंद छाँटने का हम उद्योग करते हैं, हमारा परिश्रम उतना ही बढ़ता जाता है। क्योंकि देवजी का कोई शिथिल छंद हस्तगत ही नहीं होता । जिसमें देखिए, उसमें ही कोई-न-कोई अनूठा भाव लहरा रहा है । सो प्रेमी पाठक इतने ही पर संतोष करें । यदि समय मिला, तो देव की अनूठी रचनाओं का एक स्वतंत्र संग्रह हम पाठकों की भेंट करेंगे । तब तक इतने से ही मनोरंजन होना चाहिए। २-विहारीलाल (१) क्या आपने इंद्र-धनुष देखा है ? क्या नोले, पीले, लाल, हरे रंगों का चोखा चमत्कार नेत्रों को अनुपम आनंद प्रदान नहीं करता ? काले-काले बादलों पर इंद्र-धनुष का अनुपम दृश्य भुलाने से भी नहीं भूलता। इसी प्रकृति-सौंदर्य को विहारीलाल की सूक्ष्म दृष्टि घनश्याम की हरित बाँसुरी में खोज निकालती है। बाँसरी तो हरित थी ही, अधर पर स्थापित होते ही ओंठों की लाली भी उस पर पड़ी। उधर नेत्रों की नीलिमा और पीतांबर की छाया रंगों की संख्या को और भी बढ़ा देती है। इंद्र-धनुष के सभी मुख्य रंग प्रकट दिखलाई देने लगते हैं । कैसा चमत्कारमय दोहा है। सब कवियों की सूझ इतनी विस्तृत कहाँ होती है ? अधर धरत हरि के, परत ओंठ-दीठि-पट-जोति । . हरित बाँस की बाँसुरी इंद्र-धनुष-दुति होति । *

  • यद्यपि विहारीलाल का इद्र-धनुष अनुपम है और हिंदी के अन्य किसी

कवि ने वैसा इंद्र-धनुष नहीं दिखलाया है, पर सीतल का पंच-रंग बाँधन् बंधा हुआ लहरिया जिस इंद्र-धनुष को याद दिलाता है, वह बुरा नही है-