पृष्ठ:देव और बिहारी.djvu/११७

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


काव्य-कला-कुशलता यह मैं तो ही मैं लखी भगति अपूरब बाल , लहि प्रसाद-माला जु भो तन कदंब की माल | यह दोहा-छंद है । इसका लक्षण यह है- प्रथम कला तेरह धरौ, पुनि ग्यारह गनि लेहु ; पुनि तेरह ग्यारह गनौ, दोहा-लक्षण एहु । इस दोहे में ३५ अक्षर हैं, जिनमें १३ गुरु और २२ लधु हैं; अतएव इस दोहे का नाम 'मद कल' हुआ । वर्ण्य विषय परकीया का भेदांतर लक्षिता नायिका है । अर्थ- स्पष्टता, सुंदर शब्दों के प्रयोग और वर्णन-शैली की उत्तमता से इसमें अर्थ-व्यक्त एवं प्रसाद गुण भी हैं । उपर्युक्त गुणों के अतिरिक्त शृंगारमय वर्णन होने के कारण इसमें कैशिकी वृत्ति है। अलंकार तीन प्रकार के होते हैं-अर्थालंकार, शब्दालंकार ओर चित्रालंकार । अंतिम दो में तो केवल शब्दाडंबरमात्र रहता है। भाषा-साहित्य के प्राचार्य भी इनके प्रयोग को अच्छा नहीं समझते हैं, यहाँ तक कि शब्दालंकार-मूलक काव्य के विषय में देवजी की राय है- अधम काव्य ताते कहत कवि प्राचीन, प्रनि । इसी प्रकार- चित्र-काव्य को जो करत, बायस चाम चबात । इस दोहे में एक भी अक्षर व्यर्थ नहीं लाया गया है और टवर्ग और मिले हुए अक्षरों का प्रयोग न होने से दोहे का बाह्य रूप बहुत ही मनोरम हो गया है-दोहा पढ़ने में बहुत ही श्रुति-मधुर लगता है । शब्दालंकार के कम रहते हुए भी इसमें अर्थालंकारों की भरमार है। किसी कामिनी की सहज-सुंदरता में जो बात है, वह कृत्रिम अलंकारों से क्या सिद्ध होगी ? स्वयं विहारीलाल ही की राय में-