पृष्ठ:देव और बिहारी.djvu/१२

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भूमिका नहीं । प्रत्येक भाषा-भाषी मनुष्य अपने-अपने भाषा-भंडार के कुछ शब्दों को कर्कश तथा कुछ को मधुर समझते हैं । _ 'मधुर' शब्द लाक्षणिक है. 1. मधुरता-गुण की पहचान जिह्वा से होती है । शक्कर का एक कण जीभ पर पहुँचा नहीं कि उसने बतला दिया, यह मीठा है । पर शब्द तो चक्खा जा नहीं सकता । फिर उसकी मिठाई से क्या मतलब ? यहाँ पर मधुरता-गुण का आरोप शब्द में करने के कारण 'सारोपा लक्षणा' है । कहने का मतलब यह कि जिस प्रकार कोई वस्तु जीभ को एक विशेष अानंद पहुँचाने के कारण मीठी कहलाती है, उसी प्रकार कोई ऐसा शब्द, जो कान में पड़ने पर आनंदप्रद होता है, 'मधुर, शब्द' कहा जायगा। शब्द-मधुरता का एकमात्र साक्षी कान है । कान थे. विना शब्द- मधुरता का निर्णय हो ही नहीं सकता । अतएव कौन शब्द मधुर है और कौन नहीं, यह जानने के लिये हमें कानों की शरण लेनी चाहिए । ईश्वर का यह अपूर्व नियम है कि इस इंद्रिय-ज्ञान और विवेचन में उसने सब मनुष्यों में एकता स्थापित कर रक्खी है। अपवादों की बात जाने दीजिए, तो यह मानना पड़ेगा कि मीठी वस्तु संसार के सभी मनुष्यों को अच्छी लगती है । उसी प्रकार सुगंध-दुर्गध आदि का हाल है। कानों से सुनं जानेवाले शब्दों का भी यही हाल है । अफ्रीका के एक हबशी को जिस प्रकार शहद मीठा लगेगा, उसी प्रकार श्रायलैंड के एक आइरिश को भी । ठीक यही दशा शब्दों की है । कैसा ही क्यों न हो, बालक' का तोतला बोल मनुष्यमान के कानों को भला लगता है । पुरुष की अपेक्षा स्त्री का स्वर विशेष रमणीय है । कोयल का शब्द क्यों अच्छा है। और कौवे का क्यों बुरा, इसका कारण तो कान ही बतला सकते हैं। जंगल में जो वायु पोले बाँसों में भरकर अद्भुत शब्द उत्पन्न