पृष्ठ:देव और बिहारी.djvu/१२३

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बहुदर्शिता १२३ अनगने गुनन के गरब गहीर मति , निपुन सँगीत-गीत सरस प्रसगिनी । परम प्रवीन बीन, मधुर बजावनगावै, नेह उपजावै, यो रिझावै पति-संगिनी; चारु, सुकुमार भाव भौंहन दिखाय "देव", विंगनि, अलिंगन बतावति तिलंगिनी । (२) विविध देशों की जानकारी रखते हुए भी देवजी की दृष्टि केवल धनी लोगों के प्रासाद ही की ओर नहीं उठती थी- निर्धनी के नग्न निवास स्थान में भी देवजी सौंदर्य खोज निकालते थे। देवजी समदर्शी थे । निम्न-श्रेणी की जातियों में भी वे एक सत्कवि के समान कविता-सामग्री पाते थे । लाल रंग का कपड़ा पहने, डलिया में मछलियाँ रक्खे कहारिनों को मछली बेचते पाठकों ने अवश्य देखा होगा, पर उस दृश्य का अनोखा सौंदर्य पहले-पहल देवजी को प्राप्त हुआ। उन्होंने कृपया छंद-बद्ध करके वही सौंदर्य सबके लिये सुलभ कर दिया । सौंदर्य-अन्वेषण में वे निर्धन कहार की भी उपेक्षा न कर सके- जगमगे जोबन जगी है रँगमगी जोति , लाल लहँगा पै लाली ओढ़नी बहार की; झाऊ की - झबरिया मैं - सफरी फरफराति , बेचति फिरति, बानी बोलै मनहार की । चाहेऊ न चाहै चहुँ ओर ते गहत बाहै , गाहक उमाहै, राहें रोकै सुविहार की ; देखत ही मुख बिख-लहरि-सी श्रावै , लाग्यो जहर-सी हाँसी करे कहर कहार की । पर अत्युत्कृष्ट राधिका के विलास-प्रासाद का उदात्त वर्णन भी देवजी की बुद्धि से वैसे ही विलसित है-