पृष्ठ:देव और बिहारी.djvu/१४

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भूमिका स्वरूपवती स्त्री मिष्ट भाषण द्वारा अपने प्रिय पति को और भी वश में कर लेती है। मधुर स्वर न होना उसके लिये एक त्रुटि है । एक गुणी अनजान आदमी को कर्कश स्वर में बोलते देखकर लोग पहले उसको उजड्ड समझने लगते हैं । ठीक इसके विपरीत एक निर्गुणी को भी मधुर स्वर में भाषण करते देखकर यकायक वे उसे तिरस्कृत नहीं करते । सभा-समाज में वक्ता अपने मधुर स्वर से श्रोताओं का मन कुछ समय के लिये अपनी मुट्ठी में कर लेता है और यदि वह वक्ता पं. मदनमोहनजी मालवीय के समान पंडित भी हुआ, तो फिर कहना ही क्या ? सोने में सुगंधवाली कहावत चरितार्थ होने लगती है। घोर कलह के समय भी एक मधुरभाषी का वचन अग्नि पर पानी के छींटे का काम करता देखा गया है। निदान समाज पर मधुर भाषा का खूब प्रभाव है। लोगों ने तो इस प्रभाव को यहाँ तक माना है कि उसकी वशीकरण मंत्र से तुलना की है। कोई कवि इसी अभिप्राय को लेकर कहता है- कागा कासो लेत है ? कोयल काको देत ? मीठे बचन सुनाय के, जग बस में कर लेत। यहाँ तक तो हमने मधुर शब्दों का भाषा एवं समाज पर प्रभाव दिखलाया । पर हमारा मुख्य विषय तो इन मधुर शब्दों का कविता पर प्रभाव है। भाषा, समाज, चित्र, संगीत और कविता का बड़ा घनिष्ठ संबंध है ; इसलिये इनके संबंध की मोटी-मोटी बातें यहाँ बहुत थोड़े में कह दी गई। अब आगे हम इस बात पर विचार करते हैं कि भाव-प्रधान काव्य पर भी शब्दों का कुछ प्रभाव हो सकता है या नहीं । यदि हो सकता है, तो उसका प्रभाव तुलना से और विषयों की अपेक्षा कितने महत्त्व का है।