पृष्ठ:देव और बिहारी.djvu/१४९

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प्रतिभा-परीक्षा बसुधा सब साठी' में अतिशयोक्ति, 'बुझावति बैन बियोग-अंगीठी, में सम अभेद रूपक, 'नैनन ने चवौ' में स्वभावोनि, 'रसीली अहीरी' में साभिप्राय विशेष्य के विचार से परिकरांकुर और क्यों न लगै मनमोहनै मीठी ?' में काकु-अलंकार है । इनके अति- रिक्त कविराजा मुरारिदान ने अपने बृहत् “जसवंत-जसोभूषण". नामक ग्रंथ में, उपर्युक्त छंद में, सम-अलंकार की स्थापना की है । उनका कहना है-"मन की कोमलता आदि की मोम, कुसुम आदि की उपमा रहते हुए भी अहीरी के संबंधी माखन, दूध, दही, छाछ, घृत आदि की उपमा अहीरी के विषय में यथायोग्य होने से सम-अलंकार है ( जसवंत-जसोभूषण, पृष्ठ ५६०)।" 'सुधा बसुधा' में यमकालंकार भी स्पष्ट है । नेत्रों से 'नेह' चूते भी अर्थात् अग्नि-प्रदीप्ति-कारक कारण के उपस्थित रहते भी 'बियोग-अँगीठी' का बुझ जाना कारण के विरुद्ध कार्य होता है । यह विभावना अलंकार का रूप है। कहीं-कहीं 'माखन-सो तन' पाठ भी पाया जाता है। इस पाठ के समर्थन-कर्ताओं का कथन है कि सखी ने नायिका के प्रायः सभी प्रकट अंगों में दुग्धादि गुणों का आरोपण किया है और मन का हाल सखी नहीं जान सकती है, सो मन के स्थान पर 'तन' चाहिए। परंतु मन के पोषक कहते हैं कि कोमलता की ओर इंगित रहते भी 'माखन-सो तन' कहने में कुष्ठी के शरीर का स्मरण हो जाता है, इस कारण वह पाठ त्याज्य है । अंतरंगा सखी नायिका की मन-कोमलता अनुभव से जान सकती है। छंद किरीटी सवैया है, जिसमें ८ भगण होते हैं। दोनों कवियों की प्रतिभा-परीक्षा हम प्रांगे इसी प्रकार करेंगे और उल्लिखित दोनों बातों का-छंद-प्रयोग और कथन-शैली के बारे में भी भरसक ध्यान रखेंगे।