पृष्ठ:देव और बिहारी.djvu/१६८

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


१७६ देव और विहारी इच्छा से प्रेरित कवि का मर्मस्पर्शी हृदयोद्गार मन को कैसा भय- भीत कर रहा है ! देखिए- तेरो कयो करि-करि, जीव रह्यो जरि-जरि, । हारी पाँय परि-परि, तऊ तें न की सॅभार ; ललन बिलोकि "देव" पल न लगाए, तब यों कल न दीनी तै छलन उछलनहार । ऐसे निरमोही सों सनेह बॉधि हौं बधाई आपु बिधि बूड़या माँझ बाधा-सिंधु निराधार ; एरे मन मेरे, ते घनरे दुख दीन्हे; अब ए केवार देकै तोहिं {दि मारौं एक बार । . पर जिस मन-मति के मिलने के कारण देवजी और सब मित्रों का साथ छोड़ चुके हैं, क्या सचमुच वे उसको मर जाने देंगे ? नहीं-नहीं, ऐसा कभी नहीं हो सकता । यह तो केवल डराने के लिये था । अस्तु । निम्नलिखित छंद द्वारा वे विषयासक्त मन की कैसी निंदा करते हैं और शुद्ध मन के प्रति अपना अनुराग कैसे कौशल से दिखलाते हैं- ऐसो जो हौं जानता कि जह तू बिषै के संग , एरे मन मेरे, हाथ-पाँव तेरे तोरतो; आजु लौ हौं कत नर-नाहन की नाहीं सुनि नेह सों निहारि हारि बदन निहोरतो । चलन न देतो "देव" चंचल अचल करि, चाबुक-चितावनीन मारि मुंह मोरतो; मारो प्रेम-पाथर नगारो दै गरे सों बॉधि राधाबर-बिरुद के बारिध मैं बारतो । निदान देवजी ने मन को, माणिक, अतः वाणिज्ययोग्य, फिर दलाल-सा वर्णन किया । मन-रक्षा के लिये चितावनी दी