पृष्ठ:देव और बिहारी.djvu/१७८

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


१८६ देव और विहारी उन्होंने अपने एक ग्रंथ में स्वीकार भी किया है। दासजी की कविता के समालोचकों में घोर मत-भेद है। एक पक्ष का कथन है कि उन्होंने अधिकतर अपने पूर्ववर्ती कवियों के भाव ही अपनी कविता में रख दिए हैं । भावापहरण करते समय जो कुछ फेरफार उन्होंने पूर्ववर्ती कवियों के भावों में कर दिया है, उससे पहले भावों की न तो रक्षा हुई है और न उनमें किसी प्रकार का सुधार ही हुश्रा है। हाँ, भाव-चमस्कार में कुछ न्यूनता अवश्य आ गई है। इससे इन समालोचकों की राय में दासजी साहित्यिक चोरी के दोषी हैं । इस मत के विपरीत दूसरे समालोचकों की राय है कि दासजी ने पूर्ववर्ती कवियों के भाव भले ही लिए हों, परंतु उन भावों को उन्होंने अपने अनोखे ढंग से अभिव्यक्त किया है-भावों के सौंदर्य को अत्यधिक बढ़ा दिया है उनमें नूतन चमत्कार उपस्थित कर दिया है। हमने दासजी एवं उनके पूर्ववर्ती कवियों के भाव-सादृश्यवाले बहुत-से छंद एकत्र किए हैं। उनकी संख्या दो-चार नहीं है, दस- पाँच भी नहीं, सैकड़ों तक पहुंच गई है। इतना ही नहीं, इनके और इनके पूर्ववर्ती कवियों के ग्रंथों के अनेक अध्यायों में अद्भुत सादृश्य पाया जाता है। ऐसे सादृश्य-पूर्ण अध्यायों का संग्रह भी हम कर रहे हैं। दासजी ने संस्कृत-कवियों के अनेक श्लोकों का यथातथ्य अनुवाद भी कर डाला है। इस प्रकार के कुछ श्लोक पं० पद्मसिंह शर्मा ने, 'सरस्वती' में, समय-समय पर, प्रकाशित भी कराए हैं। हमको इसी प्रकार के कुछ श्लोक और दासजी-कृत उनके अनुवाद और भी मिले हैं। इनका भी एक संग्रह करने का हमारा विचार है । ब्रज- भाषा के पूर्ववर्ती सुकवियों में से प्रायः सभी की कविताओं से दासजी ने लाभ उठाया है। पर विहारी, मतिराम, सेनापति, केशव, रसखान और देव के भावों की छाया इनकी कविता में बहुत स्पष्ट दिखलाई पड़ती है। तोष इनके समकालीन थे, पर उनका 'सुधानिधि-ग्रंथ