पृष्ठ:देव और बिहारी.djvu/२००

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२०८ देव और विहारी विहारी को केशव से बढ़कर दिखलाया है। इस प्रयल ने वे कहाँ तक सफल हुए हैं, इसको हम यहाँ नहीं लिखेंगे। यहाँ इतना कहना पर्याप्त है कि उनकी सम्मति सर्वसम्मत नहीं है और उसने मतभेद का स्थान है। केशव को छोड़कर विहारी के और प्रतिद्वंद्वी कवियों का मुकाबला कराए विगा ही भाष्यकार महोदय विहारी- लाल को विजय-सिंहासन पर विठला रहे हैं ! हिंदी-साहित्य-सूर महात्मा सूरदास ने विरह-वर्णन करने में कोई कसर नहीं उठा रक्खी है, पर उनकी एक भी सूर्तिः संजीवन-भाष्य में देखने को नहीं मिलती। कविवर देव ने वियोग-श्रृंगार-वर्णन करने में त्रुटि नहीं की है, परंतु उनका भी कोई छंद दृष्टिगत नहीं होता। क्या उक्त दोनों कविवर इतने गए-बीते हैं कि भाष्यकार ने उनकी उपेक्षा करने में ही विहारी का गौरव समझा ? क्या उनके विरह-वर्णन तोष और सुंदर से भी गए-बीते होते हैं ? कदाचित् स्थानाभाव-वश देव और सुर की सुनवाई न हुई हो, पर क्या सतसई के आगे प्रकाशित होनेवाले भागों में उनके विषय में कुछ रहेगा ? कम-से-कम प्रका- शित खड में तो इस बात का कुछ भी इशारा नहीं। फिर स्थान का अभाव हम कैसे मान लें ? सूर और देव को पछाड़े विना विहारीलाल विरह-वर्णन में सर्व- श्रेष्ठ प्रमाणित नहीं हो सकते । इन उभय कविवरों के विरह-वर्णन से विहारी के विरह-वर्णन की तुलना न करके भाष्यकार ने विहारी, सर एवं देव तीनों ही के साथ अन्याय किया है-घोर अन्याय किया है। सूरदास के संबंध में तो हम यहाँ कुछ नहीं लिखेंगे, पर देवजी का विरह-वर्णन पाठकों के सम्मुख अवश्य उपस्थित करेंगे। विहारी और देव दोनों के वर्णन पढ़कर पाठक देखेंगे कि किसकी उक्ति में कैसा चमत्कार है ! विहारीलाल-कृत विरह-वर्णन सतसई- संजीवन-भाष्य में संपूर्ण दिया हुआ है। इस कारण यहाँ पर