पृष्ठ:देव और बिहारी.djvu/२२१

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तुलना २२६ नदी में स्नान करने को घुसी हैं । वस्त्र उतारकर तट पर रख दिए हैं । देव के मनमोहन को बदला लेने का उत्तम अवसर मिल गया। एक गोपी की शरारतं का फल अनेक गोपियों को भोगना पड़ा। चीर-हरण के इस चमत्कार-पूर्ण चित्र को चित्रण देवजी ने नांचे- लिखे पद्य में अनोखे ढंग से किया है । दोहे के 'बतरस' शब्द को छंद में जिस प्रकार अमली-जीता-जागता रूप प्राप्त हुआ है, वह भी अपूर्व है। प्रश्नोत्तर का ढंग बड़ी ही मार्मिकता से 'बतरस' को सजीव करके दिखला रहा है- कंपत हियो न हियो कंपत हमारो ; यो हँसी तुन्हे अनोखी नेकु सात मैं ससन देहु ; अंबर-हरैया, हरि, अंबर उजेरो होत ; हेरि कै हँसै न कोई ; हँसै, तो हँसन देहु । "देव" दुति देखिबे को लोयन में लागी रहै ; लोयन में लाज खागै; लोयन बसन देहु । इमरे बसन देहु, देखत हमारे कान्ह , . अजहूँ बसन देहु ब्रज मैं बसन, देहु ! मोपियाँ कहती हैं-"हमारा हृदय कॉप रहा है (कंपत हियो )" उत्तर में कृष्णचंद्र कहते हैं-"पर हमारा हृदय तो नहीं कॉपढ़ा है (न हियो कंपत हमारो)।" फिर गोपियाँ कहती हैं-"अरे चीर-हरण करनेवाले (अंबर-हरैया) ! देखो, आसमान में सफेदी छाती जाती है। (अंबर उजेरो होत)। लोग देखकर हँसेंगे।" कृष्णचंद्र कहते हैं-"हँसेंगे, तो हँसने हो। हमें क्या ?" इत्यादि। अंत में कितनी दीन वाणी है-"हमरे बसन देहु, देखत हमारे कान्ह, अजहूँ बसन देहु ब्रज मैं बस देहु ।” गर्व का संपूर्ण खर्च होने के बाद एकमात्र शरण में आए हुए की कैसी कलप, डील वाली है ! " सकर मौन हँसै, देन कहै, नटि जाय" का कैसा