पृष्ठ:देव और बिहारी.djvu/२२७

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तुलना प्रवाहमात्र से यमुना-जल खरौहीं (खारा) हो जाता है-अल्प कारण से बहुत बड़ा कार्य साधित हो जाता है, तो दूसरी ओर भी पानी से चुचाती चूनरी के निचोड़ने से रंग जाने की कौन कहे, चित्त में चौगुना रंग और चढ़ता है। कारण के विरुद्ध कार्य होता है और सो भी अन्यत्र । निचोड़ी जाती है चूनरी, पर रंग चढ़ता है नायिका के चित्त में और ऐसा हो भी, तो क्या आश्चर्य ; क्योंकि लला के निचोरत' तो ऐसा होना ही चाहिए ! दोनों पद्यों का शेष अर्थ स्पष्ट ही है । उभय कविवरों की उक्लियों पर ध्यान देने की प्रार्थना है। उभय कविवरों के जो पाँच-पाँच छंद ऊपर दिए गए हैं, उनमें विशेषकर भाव-विषमता ही देखने योग्य है। पाठकों को आश्चर्य होगा कि इस प्रकार के उदाहरण पढ़कर उभय कविवरों के विषय में अपना मत स्थिर करना कैसे सरल हो सकेगा! उत्तर में कहना यही है कि इस प्रकार का उदाहरण-क्रम जान-बूझकर रक्खा गया है। गहराई देखे विना जैसे उँचाई पर ध्यान नहीं जाता, भाङ्-मास की अमावस्या का अनुभव किए विना जैसे शादी पूर्णिमा प्रसन्नता का कारण नहीं होती, वैसे ही बिलकुल विरुद्ध भावों की कविताओं को सामने रक्खे विना समान भाववाली कविताओं पर यकायक निगाह नहीं दौड़ती। काले और गोरे को एक बार भली भाँति देख चकने के बाद ही हम कहीं कह सकते हैं कि काले की यह बात सराहनीय है, तो गोरे में यह हीनता है। हमने देव के प्रायः सभी छंद संयोग-शृंगार संबंधी दिए हैं, क्योंकि संयोग-वर्णन देव ने अनूठा किया है। बिहारीलाल के विषय में भाष्यकार की राय है कि विरह-वर्णन में उनको कोई नहीं पाता। इस कारण उनके पाँच में से चार दोहे वियोग-संबंधी दिए गए हैं। कुछ लोगों की राय में विहारीलाल के सभी दोहे अच्छे है। कारण हमने जो दोहे हमको अच्छे लगे, वही पाठकों के सम्मुख