पृष्ठ:देव और बिहारी.djvu/२७

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देव और विहारी भूलों में पड़ने से बचा लिया; एतदर्थ हमें उनका कृतज्ञ होना चाहिए। आज कल जिस प्रकार की समालोचना प्रचलित है, वह अँगरेज़ी चाल के आधार पर है । जैसी जिस समय लोगों की रुचि होती है, वैसी ही उस समय समालोचनाएँ भी निकला करती हैं। इस कारण समालोचना भी भिन्न-भिन्न समय में भिन्न-भिन्न प्रकार की होती है। आज कल संपादक लोग किसी पुस्तक के अनुकूल या प्रतिकूल अपनी सम्मति प्रकाश कर देने ही से अपने को उत्तम समालोचक समझने लगते हैं, मानो निज अनुमति-अनुमोदनार्थ कतिपय पंक्तियों का उद्धृत करना, उसी के आधार पर कुछ कारणों की सृष्टि कर देना तथा अपने माने हुए गुण-दूषणों की पूर्ण तालिका दे देना ही समालोचना है। जो समालोचक बिष्ट कल्प- नाओं की सहायता से किसी स्पष्टार्थ वाक्य के अनेकार्थ कर दे, उसकी वाहवाही होने लगती है-लोग उसे सम्मान की दृष्टि से देखने लगते हैं। आज कल के समालोचकों के कारण ग्रंथकर्ता की यथार्थ योग्यता का प्रायः प्रस्फुटन नहीं होने पाता-जो समालोचनाएँ निकलती हैं, उनमें ग्रंथकर्ता का अधिकतर अनादर ही देख पड़ता है। समालोचक अपना आधिपत्य तथा समालोच्य विषय में अपनी योग्यता को पहले ही से अत्युच्च श्रासन दे देता है, यहाँ तक कि फिर समालोच्य विषय का नामोल्लेखमात्र ही होता है। हाँ,गासमालोचक के सार्वदेशिक ज्ञान का पूर्णोल्लेख अवश्य हो जाता है। समालोचना-भर में समालोचक ही की प्रतिभा का विकास दिखलाई पड़ता है, ग्रंथ का नाम तो विवशता-वश कहीं पर श्रा जाता है । बहुत-सी समालोचनाएँ ऐसी भी निकलती हैं, जिनमें टाइटिल पेज का उल्लेख करके फिर पुस्तक के विषय