पृष्ठ:देव और बिहारी.djvu/२७५

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परिशिष्ट २८३ श्रोझिल है आई, झुकि उझकी झरोखा, रूप- . भरसी झलकि गई झलकनि भाँई की ; पैने, अनियारे के सहज कजरारे ,चख, चोट-सी चलाई चितवनि-चंचलाई की । कौन जाने कोही उड़ि लागी डीठि मोही, उर रहै अवरोही "देव" निधि ही निकाई की; अब लगि आँखिन को पूतरी-कसौटिन मैं, ___ लागी रहै लीक वाकी सोने-सी गोराई की। देवजी की कविता में जिन विषयों का वर्णन है, ठीक उन्हीं विषयों का वर्णन देवजी के कई पूर्ववर्ती कवियों ने भी किया है। इस कारण पूर्ववर्ती और परवर्ती कवियों की कविता में सदृश- भाववाले पद्य प्रचुर परिमाण में पाए जाते हैं। ऐसा होना नितांत स्वाभाविक भी है। संसार का ऐसा कोई भी कवि नहीं है, जो अपने पूर्ववर्ती कवियों के भावों से लाभान्वित न हुआ हो। शेक्सपियर के हेनरी छठे-नामक नाटक में लगभग ६,००० पंक्तियाँ हैं। इनमें से प्रायः एक-तिहाई तो मौलिक हैं; शेष दो- तिहाई पूर्ववर्ती कवियों की कृति से अपनाई गई हैं। हमारे कालिदास और तुलसीदास की भी यही दशा है। ब्रजभाषा-कविता के सर्वस्व सुकवि विहारीलाल की सतसई का भी यही हाल है। एक अंगरेज़ समालोचक ने क्या ही ठीक कहा है कि यदि कोई कवि केवल इस इरादे से कविता लिखने बैठे कि मैं सर्वथा मौलिक* भावों की ही रचना करूँगा, तो अंत में उसकी रचना में कविता की अपेक्षा विचित्रता के ही दर्शन अधिक होंगे। बड़े-बड़े कवि जब कभी अपने पूर्ववर्ती कवियों के भाव लेते हैं, तो उनमें

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being merely pecaliar (James Russel Lowell on Wordsworth.) .