पृष्ठ:देव और बिहारी.djvu/४८

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भूमिका

पावस न, दीसी यह पावस नदी-सी, फिरें उमड़ी असगत, तरगित उरनि सों। लाज-काज, सुख-साज, बंधन-समाज नॉघि निकसीं निसक, सकुचें नहीं गुरनि सौं; मीन-ज्यो अधीनी गुन कीनी खैचि लीनी "देव" बसविार बंसी डार बंसी के सुरनि सो । देव माइकेल मधुसूदनदत्त और देव की कविता में महान् अंतर है। मुरलिका पर अकेले सूरदास ने इतना लिखा है कि अन्यत्र उसकी तुलना मिल नहीं सकती; पर खेद है, ब्रजभाषा के सूर को वर्तमान हिंदी-प्रेमी नहीं पढ़ेंगे ओर मधुसूदनदत्त के काव्य का अनुवाद चाव से पढ़ेंगे ! विहारी के साथ अनुचित पक्षपात संजीवन-भाष्यकार के दर्शन हमें टीकाकार और समालोचक की हैसियत से हुए हैं। पाठकों को स्मरण होगा कि हैज़लिट साहब की राय में समालोचक को सदा निष्पक्षपात रहना चाहिए। उसका यह कर्तव्य है कि जिस ग्रंथ की वह टीका लिख रहा हो या जिसकी वह समालोचना कर रहा हो, उसके गुण-दोष सभी स्पष्टतया दिखला दे। कवि विशेष पर असाधारण भक्ति के वशी- भूत होकर ऐसा न करना चाहिए कि उसके दोषों को छिपाए । इस प्रणाली का अवलंब लेना मानो सर्वसाधारण को धोखा देना है। संस्कृत-ग्रंथों पर मल्लिनाथ-सदृश टीकाकारों की जो टीकाएँ हैं,वे पक्षपात- शून्य होने के कारण ही आदरणीय हैं । सत्यप्रिय अँगरेज़-टीकाकारों की भी यही दशा है । संजीवन-भाष्य भी हम इसी प्रकार का चाहते थे; पर खेद के साथ कहना पड़ता है कि उसका प्रथम भाग देख-