पृष्ठ:देव और बिहारी.djvu/५९

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


देव और विहारी रहे हैं, जिसके कारण देव और सूर की उक्तियाँ विहारी के दोहों के पास नहीं फटकने पाई हैं । ग्वाल, सुंदर, गंग, पद्माकर एवं जीवित कधियों में शंकर तक की उक्तियाँ उद्धृत की गई हैं, पर सूर, देव, बेनी- प्रवीन, रघुनाथ, सोमनाथ, देवकीनंदन, भौन, केशव और तुलसी का विरह-वर्णन पढ़ने को अप्राप्त है। हमने इन कवियों के नाम यों ही नहीं गिना दिए हैं। वास्तव में इन कवियों ने विरह का अपूर्व वर्णन किया है। यदि हिंदी-कवियों के विरह-वर्णन पर स्वतंत्र निबंध लिखने का हमें अवसर प्राप्त होगा, तो हम दिखलाबेंगे कि इन सबका विरह-वर्णन कैसा है। [च] मिश्रबंधु-विनोद और नवरत्न के रचयिताओं पर भी भाष्यकार ने नाना भाँति के आक्षेप किए हैं। कहीं 'मेसर्स मिश्र-बंधुत्रों का फुल बेंच' बनाया गया है, तो कहीं पर “सखुन-फहमी मिश्र-बंधुवाँ मालूम शुद" लिखकर उनकी हँसी उड़ाने की चेष्टा की गई है। विहारी- लाल के चरित्र को अच्छा न बतलाने के कारण उन पर कविवर के चरित्र को जान-बूझकर सदोष दिखलाने की 'गर्हणीय दुश्चेष्टा' का अभियोग भी लगाया गया है। कहीं-कहीं पर भाष्यकार ने उनको गुरुवत् उपदेश-सा दिया है ; यथा 'ऐसा न लिखा कीजिए ; ऐसा लिखिए।' धमकी की भी कमी नहीं है। संजीवन-भाष्य के भविष्य में प्रकाशित होनेवाले भागों में उनके प्रति और भी ऐसी ही 'सत्स- मालोचना' का वचन दिया गया है । साधु और विद्वान् समालोचकों द्वारा यदि ऐसी संयत भाषा में समालोचना न होगी, तो कदाचित् हिंदी की उन्नति में कमी रह जायगी! इसीलिये भाष्यकार समालो- चना के सतसई-संहारवाले श्रादर्श पर “सौ जान से फ़िदा हैं।" । नवरत्न के रचयितानों पर जितने आक्षेप भाष्यकार ने किए हैं, उनमें से एक भी ऐसा नहीं है, जो मत-भेद से खाली हो । यदि