पृष्ठ:देव और बिहारी.djvu/८

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भूमिका कर सकेगी, इसमें भी कुछ संदेह नहीं है । समग्र योरप के लाभ के लिये स्पिरांटो भाषा का साहित्य बढ़ाना चाहिए, परंतु अँगरेज़ी, फरासीसी, आइरिश आदि देशी एवं प्रादेशिक भाषाओं की भी उन्नति होती रहनी चाहिए । इसी प्रकार समग्र राष्ट्र के विचार से खड़ी बोली में कविता होनी चाहिए, परंतु परिचित हिंदी-भाषी जनता एवं प्रादेशिक लोगों के हित का लक्ष्य रखकर ब्रजभाषा में की जाने- वाली कविता का गला घोटना ठीक नहीं। ब्रजभाषा में कविता होने से खड़ी बोली की कविता को किसी प्रकार की हानि नहीं पहुँच सकती। दोनों को मिल-जुलकर काम करना चाहिए। हमारी' राय में खड़ी बोली ब्रजभापा में प्रचलित कविता-संबंधी नियमों का अनुकरण करे और ब्रजभापा खड़ी बोली में व्यक्त होनेवाले सामयिक विचारों से अपने कलेवर को विभूषित करे। ऊपर हमने ब्रजभाषा-दुर्बोधता बढ़ानेवाले तीन कारणों का उल्लेख किया है। उनके क्रम में ढिलाई होने * से ही यह दुर्बोधता जा सकती है। कहने का अभिप्राय यह है कि यदि पाठ्य पुस्तकों में ब्रजभाषा की अच्छी कविताएँ रक्खी जायँ, लोग उसका प्राचीन पद्य-काव्य पढ़ें-उससे घृया न करें एवं पन्न-संपादक ब्रजभाषा में की गई कविता को भी अपने पत्रों में सादर स्थान दें, तो इस दुर्बोधता-वृद्धि का भय न रहे। लेकिन कौन सुनता है ! प्राचीन पद्य-काव्य पढ़ने की ओर लोगों की रुचि मुकाने के लिये एक मुख्य और अच्छा-सा साधन यह भी हो सकता है कि प्राचीन अच्छे-अच्छे ग्रंथों के ऐसे सटीक संदर संस्करण प्रकाशित किए जाय, जिनसे लोग कविता की खबियाँ समझ सकें और इस प्रकार प्राचीन काव्य पढ़ने की ओर उनका चित्त श्राकर्षित हो ।

  • संतोष के साथ लिखना पड़ता है कि तीनों ही कारणों में ढिलाई

हुई है और आज ब्रजभाषा पर लोगों का अनुराग बढ़ रहा है।