पृष्ठ:देव और बिहारी.djvu/९९

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


काव्य-कला-कुशलता १०५ समय गर्मी से विकल 'घनश्याम' ( काले मेघ अथवा श्यामसुंदर) का मार्ग देखना, उनके आगमन के लिये उत्कंठित होना कितना विदग्धता-पूर्ण कथन है। संभव है, विकल प्रकृति-सुंदरी ही धन- श्याम का स्वागत करने को उत्कंठित हो रही हो । कौन कहता है, हिंदी के प्राचीन कवि स्वाभाविक वर्णन करना नहीं जानते थे- खरी दुपहरी, हरी-भरी, फरी कुज मजु, गुज आल-पुंजन की "देव" हियो हरि जात; सीरे नद-नीर, तरु सीतल गहीर डॉह, सोवै परे पथिक, पुकारै पिकी करि जात । ऐसे मै किसोरी भोरी, कोरी, बुम्हिलाने मुख, पंकज-से पाय धरा धीरज सो धरि जात; सौहै .घनश्याम-मय .. हेरति हॅथेरी-श्रोट, ऊंचे धाम वाम चढि श्रावति, उतरि जात । कोमल-कांत पदावली की कमनीयता के विषय में हमें कुछ भी नहीं कहना है- पाठक स्वयं उसका अनुभव करें, परंतु इतना हम दृढ़तापूर्वक कहते हैं कि छंद में एक शब्द भी व्यर्थ नहीं है। व्यर्थ क्यों, हमारी तुच्छ सम्नति में तो प्रत्येक से विदग्धता-सरिता प्रवा- हित होती है। स्वभाव और उपमा को मुख्य माननेवाले कविवर देवजी का उपर्युक्त छंद ग्रीन-मध्याह्न का स्वभावमय चित्रण है। (२) लीजिए, ग्रीष्म-रात्रि का उपमा-निबद्ध वर्णन भी पढ़िए- फटिक-सिलान सों सुधारयो सुधा-मंदिर, ___उदधि-दधि को सो अधिकाई उमगे अमंद बाहेर ते भीतर लौं भीति न दिये "देव', दूध-कैसो फेनु फैलो आँगन-फरसबंद | तारा-सी तरुनि तामै ठाढ़ी झिलिमिलि होति, मोतिन की जोति मिली मल्लिका को मकरंद