पृष्ठ:नव-निधि.djvu/५४

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मर्यादा की वेदी

मीरा यहाँ से राणा की सेवा में पहुँची। वे उसका बहुत आदर करते थे। वे खड़े हो गये। इस समय मीरा का श्राना एक असाधारण बात थी। उन्होंने पूछा-बाई जी, क्या प्राज्ञा है?

मीरा-आपसे भिक्षा माँगने आई हूँ। निराश न कीजिएगा। मैंने आज तक आपसे कोई विनती नहीं की, पर आज एक ब्रह्म-फाँस में फंस गई हूँ। इसमें से मुझे आप ही निकाल सकते हैं ? मन्दार के राजकुमार को तो आप जानते हैं ?

राणा- हाँ, अच्छी तरह।

मीरा - आज उसने मुझे बड़ा धोखा दिया। एक वैष्णव महात्मा का रूप धारण कर रणछोड़जी के मन्दिर में पाया और उसने छल करके मुझे वचन देने पर बाध्य किया। मेरा साहस नहीं होता कि उसकी कपट-विनय आपसे कहूँ।

राणा-प्रभा से मिला देने को तो नहीं कहा ?

मीरा-जी हाँ, उसका अभिप्राय वही है। लेकिन सवाल यह है कि मैं आधी रात को राजमहल का गुप्त द्वार खोल दूँ। मैंने उसे बहुत समझाया; बहुत धमकाया; पर वह किसी भाँति न माना। निदान विवश होकर जब मैंने वादा कर दिया तब उसने प्रसाद पाया, अब मेरे वचन की लाज आपके हाथ है। आप चाहे उसे पूरा करके मेरा मान रखें चाहे उसे तोड़कर मेरा मान तोड़ दें। आप मेरे ऊपर जो कृपादृष्टि रखते हैं, उसी के भरोसे मैंने वचन दिया। अब मुझे इस फन्दे से उबारना आप ही का काम है।

राणा कुछ देर सोचकर बोले-तुमने वचन दिया है, उसका पालन करना मेरा कर्तव्य है। तुम देवी हो, तुम्हारे वचन नहीं टल सकते। द्वार खोल दो। लेकिन यह उचित नहीं है कि वह अकेले प्रभा से मुलाकात करे। तुम स्वयं उसके साथ जाना। मेरी ख़ातिर से इतना कष्ट उठाना। मुझे भय है कि वह उसकी जान लेने का इरादा करके न आया हो। ईष्या में मनुष्य अन्धा हो जाता है। बाईजी, मैं अपने हृदय की बात तुमसे कहता हूँ। मुझे प्रभा को हर लाने का अत्यन्त शोक है। मैंने समझा था कि यहाँ रहते-रहते वह हिल-मिल जायगी; किन्तु यह अनुमान ग़लत निकला। मुझे भय है कि यदि उसे कुछ दिन यहाँ और रहना पड़ा तो वह जीती न बचेगी। मुझपर एक अबला की हत्या