पृष्ठ:नव-निधि.djvu/८७

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नव-निधि


और वहाँ से निराश होकर लौट आती। फिर आप ही विचार करती-यह मेरी क्या दशा है! मुझे यह क्या हो गया है! मैं हिन्दू कन्या हूँ, माता-पिता जिसे सौंप दें, उसकी दासी बनकर रहना मेरा धर्म है। मुझे तन मन से उसकी सेवा करनी चाहिए। किसी अन्य पुरुष का ध्यान तक मन में लाना मेरे लिए पाप है। आह! यह कलुषित हृदय लेकर मैं किस मुँह से पति के पास जाऊँगी! इन कानों से क्योंकर प्रणय की बातें सुन सकूँगी जो मेरे लिए व्यंग से भी अधिक कर्ण-कटु होंगी! इन पापी नेत्रों से वह प्यारी-प्यारी चितवन कैसे देख सकूँगी जो मेरे लिए वज्र से भी हृदय-भेदी होगी! इस गले में वे मृदुल प्रेम-बाहु पड़ेंगे जो लोह-दंड से भी अधिक भारी और कठोर होंगे। प्यारे तुम मेरे हृदय-मंदिर से निकल जाओ। यह स्थान तुम्हारे योग्य नहीं? मेरा वश हेता तो तुम्हें हृदय की सेज पर सुलाती। परन्तु मैं धर्म की रस्सियों में बँधी हूँ।

इस तरह एक महीना बीत गया। ब्याह के दिन निकट आते जाते थे और प्रभा का कमल-सा मुख कुम्हलाया जाता था। कभी-कभी विरह-वेदना एवं विचार विप्लव से व्याकुल होकर उसका चित्त चाहता कि सती-कुण्ड की गोद में शान्ति लूँ। किन्तु रावसाहब इस शोक में जान ही दे देंगे, यह विचार कर वह रुक जाती। सोचती, मैं उनकी जीवन-सर्वस्व हूँ, मुझ अभागिनी को उन्होंने किस लाड़ प्यार से पाला है; मैं ही उनके जीवन का आधार और अन्तकाल की आशा हूँ। नहीं, यों प्राण देकर उनकी आशाओं की हत्या न करूँगी। मेरे हृदय पर चाहे जो बीते, उन्हें न कुढ़ाऊँगी। प्रभा का एक योगी गवैये के पीछे उन्मत्त हो जाना कुछ शोभा नहीं देता। योगी का गान तानसेन के गानों से भी अधिक मनोहर क्यों न हो, पर एक राजकुमारी का उसके हाथों बिक जाना हृदय की दुर्बलता प्रकट करता है। किन्तु रावसाहब के दरबार में विद्या की, शौर्य की, और वीरता से प्राण हवन करने की चर्चा न थी। यहाँ तो रात-दिन राग रंग की धूम रहती थी। यहाँ इसी शास्त्र के प्राचार्य प्रतिष्ठा के मसनद पर विराजित थे, और उन्हीं पर प्रशंसा के बहुमूल्य रत्न लुटाये जाते थे। प्रभा ने प्रारम्भ ही से इसी जल-वायु का सेवन किया था और उसपर इनका गाढ़ा रंग चढ़ गया था। ऐसी अवस्था में उसकी गान लिप्सा ने यदि भीषण रूप धारण कर लिया तो कोई आश्चर्य ही क्या है!