पृष्ठ:नागरी प्रचारिणी पत्रिका.djvu/१७

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चंद्रगुप्त विक्रमादित्य की पश्चिमोत्तरी विजय-यात्रा

श्री बुद्धप्रकाश एम. ९०


दिल्ली से नौ मील ठीक दक्षिण की ओर मेहरौली नामक एक गाँव है। इसमें कुतुबमीनार के पास एक लौह स्तंभ है, जिसपर एक अभिलेख उत्कीर्ण है। इस अभिलेख में चंद्र नामक एक वैष्णव सम्राट का वर्णन है, जिसने पश्चिमोत्तर में वाहॄकों २ को परास्त किया था, पूर्व मेंभोषण संग्राम के पश्चात् अंग पर अधिकार प्राप्त किया था और जिसकी कीर्ति से दक्षिण जलनिधि भी सुरभित था। प्रिसप महाशय ने प्रस्तुत अभिलेख का समय ईसा को तीसरी या चौथी शती निश्चित किया है। डा० भाऊदा जी का भी यही मत है कि उक्त अभिलेख गुप्तकाल के बाद का नहीं हो सकता। अतः अभिलेख का समय निर्विवाद रूप से सिद्ध है। प्रश्न यह उठता है कि अभिलेख में वर्णित 'चंद्र' राजा कौन थे। इस विषय में विद्वानों में बहुत मतभेद है। श्री प्लीट के मतानुसार गुप्ता साम्राज्य के संस्थापक प्रथम चंद्रगुप्त उक्त अभिलेख के चंद्र है। डा० राधा- गोविंद बसाक ने इस मन का समर्थन किया है और हाल में ही डा० कृष्णस्वामी आयंगर ने इस मत की पर्याप्त पुष्टि की है। प्लीट महाशय का यह भी संकेत है कि गाँव का नाम, जहाँ यह अभिलेख मिला है, मिहिरपुरी होने के कारण यह संभव है कि अभिलेख मिहिरकुल क. किसी छोटे भाई का हो, जिसका नाम ट्वेन च्याराँ भूल गए हों। डोहरिश्चंद्र सेठ का विचार है कि 'चंद्र चंद्रगुप्त मौर्य है, जिन्होंने उत्तर में यवनों और वाहीकों से लोहा लिया था और पूर्व में नंद राजाओं के दाँत

१--कोर्पस् इसक्रिपाशियोनम् इडिकोरम्, भाग ३,सख्या३२|

२--वाह लीक अराकोजिया के निकटवर्ती प्रदेश में रहनेवाले बक्टिनोई लोग थे, जिनका वर्णन यूनानी भगोलशास्त्री टॉलेमी ने किया है। -इंडियन एंटीक्वेरी, सन् १- पृष्ट १०८ ।

३--धी 'लोटकृत को० इ. ६०, संख्या ३२, भमिका।

४--श्री बसाककृत हिस्ट्री भाव् नार्थ ईस्टर्न इंडिया, भूमिका ।

५--जन॔व भाव् इंडियन हिस्ट्री में प्रकाशित स्टडीज इन गुप्ता हिस्ट्री। ६--श्री लीटकृत यहीं।