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चंद्रगुप्त विक्रमादित्य की पश्चिमोसरी विजय-यात्रा

बटे किए थे। डा. हेमचंद्र रायचौधरी का विचार है कि नाग वंशज चंद्रांश मेहरौली अभिलेख के 'चंद्र' हैं। अरयर महाशय ने 'चंद्र' को सदाचंद्र भारशिव बताया है, जो भवनाग के उत्तराधिकारी थे। महामहो- पाध्याय हरप्रसाद शास्त्री ने पुष्करणनरेश चंड वर्मन को 'चंद्र' सिद्ध किया है। इनका एक अभिलेख सिसुनिया में मिला है। डा. रमेशचंद्र मजूमदार के मतानुसार 'चंद्र' कुषाण सम्राट कनिष्क हैं, जिनका उपनाम कुछ तिब्बती किंवदंतियों के अनुसार 'चंद्र' था। इन सब मतों के विपरीत श्री काशीप्रसाद जायसवाल, डा. दिनेशचंद्र सरकार और डा० भार० एन. डांडेकर की संमति है कि ये 'चंद्र' गुप्त-सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के अतिरिक्त और कोई नहीं हो सकते।

उक्त मतों की आलोचना यहाँ अभिप्रेत नहीं है, क्योंकि इनमें से बहुत से मत सर्वथा निराधार और स्पष्टतया प्रमाणरहित हैं। अगर 'चंद्र' प्रथम चंद्रगुप्त हैं और उन्होंने समस्त भारत पर आधिपत्य प्राप्त कर लिया था तो उनके सुपुत्र समुद्रगुप्त की विजय यात्राओं का क्या अर्थ है ? उक्त राजा को हरा नरपति कहना अभिलेख को समय की परिधि के बाहर ले जाना है और ऐतिहासिक कल्पना के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। चंद्र. गुप्त मौर्य की इस 'चंद्र' से एकता प्रतिपादित करना डा. सेठ की मौर्य- सम्राट संबंधी प्रीति का परिचायक है, लेकिन लिपि से वे भी मजबूर हैं। श्री रायचौधरी और श्री अय्यर के विचार अनुमान मात्र हैं, इनके लिये उन्होंने कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया है। श्री मजूमदार का विचार भी इसी कोटि का है। शास्त्री जी के विचार का समर्थक केवल यह तथ्य है किसिमुनिया और मेहरौली दोनों स्थानों के अभिलेख वैष्णव अभिलेख हैं, परंतु उस समय चंद्र धर्मा इतने शक्तिशाली नहीं थे। भारत के प्रमुख शासनधर वाकाटक थे। ईसा की चौथी शताब्दी के प्रारंभ में वाकाटक राज्य-व्यवस्था के शिथिल हो जाने के कारण स्थानीय सामंतों को अवश्य

१---श्री हरिश्चंद्र सेठ कृत चद्रगुप्त मौर्य और भारत में सिकंदर की पराजय (बुलंदशहर)।

२---डा. हेमचन्द्र रायचौधरी कृत पोलीटिकल हिस्ट्री आव एशियंट इंडिया, पृष्ठ ४४९।

३---श्री डाडेकर कृत हिस्टो भाव दि गुप्ताज , पृष्ठ २७ एवं जर्नल श्राव रायन एशियाटिक सोसायटी प्राव बंगाल भाग ५, संख्या ३, सन् १९३९, पृष्ठ ४१३, डा. जायसवाल के विचारों के लिये देखिए हिस्टी आप इडिया, पृष्ठ १५०-३५० एवं जर्नल आव बिहार ऐंउ उड़ीसा रिसर्च सोसायटी, माग १९ ।