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नागरीप्रचारिणी पत्रिका


अपने प्रसार का अवसर मिल गया था और चंद्र वर्मा का सिसूनिया-अभिलेख उसको क्षणिक सफलता का सूचक है, परंतु यह कहना कि उसने बरख से बंगाल तक एकच्छत्र आधिपत्य स्थापित कर लिया था और फिर समुद्रगुप्त की प्रसारोन्मुखी शक्ति के सामने उसने घुटने टेक दिए थे,स्वाभविक नहीं प्रतीत होता । 'चंद्र' का सही पता लगाने के लिये हमें ईसा की चौथी, पाँचवीं शताब्दी में एक ऐसे सम्राट को ढूँढना है जो निम्नलिखित शतों को पूरा कर सके-

(१) जो चौथो शताब्दी के आसपास रहा हो।

(२) 'चंद्र' जिसके नाम का एक अंग हो।

(३) जिसने समस्त पृथिवी विजय करने का दावा किया हो और ऐसा किया भी हो।

(४) जिसने बंगाल में युद्ध किए हों।

(५) जिसका दक्षिण में आतंक रहा हो।

(६) जिसने पश्चिमोत्तर में विजय यात्रा की हो ।

(७) जो वैष्णव हो।

(१) इस काल में द्वितीय चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने राज्य किया था जिनका समय लगभग ईसा को ३७५ शतो से ४१४ शती तक है।

(२) 'चंद्र' उनके नाम का एक अंग था। उनके सिक्कों पर उन्हें 'चंद्र' और 'नरेंद्रचंद्र नामों से अभिहित किया गया है। (३) चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने समस्त भूमंडल को अपने अधीन कर लिया था। यह स्मरण रखना चाहिए कि उन दिनों समस्त भमंडल से तात्पर्य भारत-भूमि से ही था और उसमें भी इतना ही पर्याप्त था कि छोटे बड़े राजा और रईस सम्राट का प्रभुत्व स्वीकार कर लें। जैसा हम अभी देखेंगे चंद्रगुप्त विक्रमादित्य का राज्य वस्तुत: पश्चिमोत्तरी सीमा, गुजरात, काठियावाड़, बंगाल और दक्षिण के ऊपरी हिस्सों में फैला हुआ था। सुदूर दक्षिण के सब राजा उनके संबंधी और सहचारी थे।

(४) समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति में वंग-प्रदेश को हम समतट, डवाक और कामरूप इन तीन प्रत्यंत गज्यों में विभक्त पाते हैं। समतट दक्षिण पूर्वी बंगाल था और कामरूप असम प्रांत के निचले भाग का माम | प्लीट महाशय के मतानुसार डवाक वर्तमान ढाका है। स्मिथ ने बोगरा, दोनाजपुर और राजाशाही जिलों को डवाक सिद्ध किया है।

१-उदयगिरि का गुफा-लेख, को ८० इ०, सख्या , की पंचवीं पति- कस्नपृथिवीजमार्थेन रावेह......!