पृष्ठ:नागरी प्रचारिणी पत्रिका.djvu/२०

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चंद्रगुप्त विक्रमादित्य की पश्चिमोत्तरी विजय-यात्रा

चंद्रगुप्त विक्रमादित्य की पश्चिमोत्तरी विजय-यात्रा १५५ डा. देवदास भांडारकर का विचार है कि चटगांव और तिपेरा को पहाड़ो भूमि उवाक कहलाती थी। इन तीनों राज्यों ने समुद्रगुप्त को प्रात्म. समर्पण किया था। किंतु समुद्रगुप्त की नीति के अनुसार इन राज्यों का समूल उच्छेद कर इन्हें गुप्त साम्राज्य में नहीं मिलाया गया था। परंतु कुमारगुप्त महेंद्रादित्य के समय में हम इन प्रदेशों को पूर्णतः गुप्त-साम्राज्य के अंतर्गत पाते हैं । स्थानीय राजामों के स्थान पर गुप्त सम्राट के प्रतिनिधि ( वायसराय) चिरातदत्त इन प्रदेशों पर शासन करते हुए दृष्टिगत होते हैं। हाल में ही बैग्राम से गुप्त-संवत् १२८ (ईसवी सन् ४४७.४८ ) का एक शिलालेख मिला है जिससे ज्ञात होता है कि पंचनगरी विषय में, जो उत्तरी बंगाल में होगा, कुमारामात्य कुलवृद्धि शासन करते थे। सारांश यह कि कुमारगुप्त के समय में यह प्रदेश पूर्णतः गुप्त साम्राज्य का अंग बन गया था। प्रश्न उठता है कि किसके राज्य में और किसने इन प्रदेशों को जीतकर गुप्त-साम्राज्य में मिलाया और क्यों ? कुमारगुप्त जैसे विलासी और आलसी सम्राट का यह काम था, इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता। समुद्रगुप्त को ऐसा करने की कोई श्रावश्यकता ही नहीं थी, क्योंकि इन राजाओं ने पहले ही स्वेच्छा मे मात्मसमर्पण कर दिया था। अतः स्पष्ट है कि समुद्रगुप्त और कुमारगुप्त के मध्यवर्ती राजा ने वंग-प्रदेश को पराजित कर वहाँ की स्वायत्तताका समूल उच्छेद किया था। विभिन्न साधनों से परिलक्षित होता है कि रामगुप्त के राज्यारोहण के पश्चात् गुप्त साम्राज्य में एक भीषण स्वतपती मची थो। उत्तर में शकों और सासानियों का भयानक आक्रमण दुमा था, जो चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के शौर्य और पराक्रम द्वारा हो खदेड़ा गया। दक्षिण में वाकाटके ने जरूर कुछ सरगर्मी दिखाई होगी, जिसके कारण चंद्रगुप्त को अपनी कन्या प्रभावती गुप्त का विवाह वाकाटक-कुल में करना पड़ा। अतः यह संभव है कि इस मांदोलन में बंगाल के प्रत्यंत नृपतियों ने भी अपनी स्वतंत्रता उद्घोषित की हो और चंद्रगुप्त को मजबूर होकर इन राजाओं का पूर्ण विध्वंस करना पड़ा हो। इस भीषण संग्राम की ही १-को• ई. ई., संख्या 1. पंलि २२ । समतट-डवाक-कामरूप-नेपाल-कर्तृ पुरादिप्रत्यन्तनृपतिमि... ...सर्वकरदामाज्ञाकरणप्रणामागमनपरितोषितप्रचण्डशासनस्य । २-एपिप्राफिया इंडिका, भाग १५, पृष्ठ १३०-३१ में गुप्त-संवत् १२४ और १२९ के दामोदरपुर के ताम्रपत्र-लेख । ३-बाही, माग २१, पृष्ठ ७८ ।