पृष्ठ:नागरी प्रचारिणी पत्रिका.djvu/२२

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चंद्रगुप्त विक्रमादित्य की पश्चिमोत्तरी विजय-यात्रा

चंद्रगुप्त विष मादित्य की पकिमोत्तरी विजय-यात्रा १५७ में विक्रमादित्य के सामने उपस्थित किए थे। यह पद्य भी गारप्रकाश में उद्घत है। क्षेमेंद्र ने 'औचित्यविचारचर्चा' में भी कालिदास के 'कुंतेश्वर-दौत्य' का जिक्र किया है। बाद में जब कुंतल पर कदंब राजा काकुत्स्थ वर्मा का अधिकार हो गया था तब उन्होंने गुप्त सम्राटों के आतंक से अभिभूत हो अपनी कन्या का विवाह गुप्त-सम्राट से किया था, जो संभवतः प्रथम कुमारगुप्त होंगे। यह तथ्य तालगुंद के अभिलेख में वर्णित है। कुमारगुप्त के कुछ सिक्के सितारा जिले में मिले हैं, जिनसे दक्षिण मे गुप्त-सम्राटों के प्रभाव को पर्याप्त पुष्टि होती है। अतः स्पष्टतः सिद्ध है कि दक्षिण में गुप्त-आधिपत्य का संस्थापन चंद्रगुप्त विक्रमादित्य का ही कार्य था। मेहरौली-अभिलेख में इसका कवित्वपूर्ण, सरस एवं सुंदर वर्णन है। () पहले संख्या सात पर विचार कर लेना अधिक उपयुक्त होगा। चंद्रगुप्त विक्रमादित्य वैष्णव थे, यह निस्संदिग्ध है। मथुरा और गढ़वा के शिला-लेखों में उन्हें परम भागवत कहा गया है। घुड़सवार ढंग के सिक्कों पर जो लेख ऊपरी ओर उटूंकित है उसमें भी चंद्रगुप्त को परम भागवत कहा गया है। चांदी के सिक्कों पर भी जो लेख काठियावाड़ी लिपि में है उसमें चंद्रगुप्त के लिये 'परमभागवत' विशेषण का प्रयोग किया गया है। अतः स्पष्ट है कि चंद्रगुप्त वैष्णव धर्मावलंबी थे और उन्हीं की स्मृति में मेहरौली का स्तंभ स्थापित किया गया था, तथा उसपर उक्त अभिलेख उत्कीर्ण किया गया था। (६) उक्त विवेचन द्वारा निर्विवाद रूप से सिद्ध होता है कि मेहरौलो अभिलेख के 'चंद्र' सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य हो हैं। उनके १-प्रोसीडिंग्स प्राव दि थर्ड ओरियंटल कान्फरेंस (१९२४ ), पृष्ठ ६ । कालिदास ने ही कदाचित् द्वितीय प्रवरसेन के ताम्रपत्र-लेनों का संपादन किया हो, जिन्हें हाल में ही महामहोपाध्याय मिराशी जी ने पत्तन से प्राप्त किया है। २-काकुत्स्य वर्मा का समय श्री एन. लक्ष्मीनारायण राव ने ईसा की ४३५ शती-४७५ शती तक सिद्ध किया है । अतः सभव है यह विवाह-संबंध कुमारगुप्त से ३-यत्याद्याप्यधिवास्यते जलनिधिवीर्यानिले दक्षिणः, पंक्ति २ । ४-को. ई. ई., संख्या ४ और ७ पंक्ति ११ और १ । ५-एखन कत केटलाग श्राव दि इंडियन क्वायन्स इन दि ब्रिटिश म्यूजियम, गुप्ता डाइनेस्टीज, पृठ ४५ । ६-वही, पृष्ठ ४९-५१ ।