पृष्ठ:नागरी प्रचारिणी पत्रिका.djvu/३०

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'कुसशा'शब्द का अर्थ

१६५ म्सन'कठिन नाम की प्रथा साक्टर मांडारकर कुस' का अर्थ 'कशाण राजा का सिका' करते हैं। कुछ विद्वानों ने भाग्वेद तथा अथर्ववेद में प्रयुक्त 'कृशन' शब्द से इसका साम्य देखकर इसका अर्थ 'मोतो' और 'सुवर्ण किया है। सायण ने ऋग्वेद में आए 'कशन' शब्द का अर्थ 'सुवर्ण किया है और संभवत: इसी के आधार पर मोनियर विलियम्स ने अपने संस्कृत-कोश में 'कृशन' के मोती और सुवर्ण दोनों अर्थ दिए हैं। श्री दिनेशचंद्र सरकार ने जहाँ 'कुसण' और 'कृशन' का साम्य दिवाने का प्रयास किया है वहाँ यह संभावना भी प्रकट की है कि यह 'कृशान' (प्रमुख्याहार) शब्द हो सकता है। डाक्टर त्रिभुवनदास लहेरचंद शाह ने तो 'कुसण' को 'कुशाण' बनाकर उषवदात को जैन बनाया है। प्राचीन ग्रंथों में 'कुसण' का अर्थ वस्तुत: 'कुसण' शब्द न तो संस्कृत का है और न प्राकृत का। अतएव संस्कृत या प्राकृत शब्दों के साथ इसका साम्य बैठाने का प्रयास उपयुक्त नहीं है। श्री हेमचंद्राचार्य द्वारा रचित देशोनाममाला' में और 'पाइप्रसह- महराणवो' में 'कुसण' शब्द को गणना देशी शब्दों में को गई है। देखिए- कुटाकुमारिकुटपरी कोसहरिनार चंडीए। कुहिम वित्तम्मि कुहेरी गुरेशम्मि तीमणे कुसणं ।। इसी देशी शब्द का अर्थ 'बृहत्कल्पसूत्र' के चौथे भाग में इस प्रकार दिया है- कुसणं मुद्रगदाल्पादि तस्य यदुदकं नापि असणम् । 1-दि मीनिंग भाव दिसटर्म इज डाउसफुख । एम. नार ट्रांसलेट्स 'मनी फार भाउटसाइड खाइफ' । बट इट वुड सौम प्रोबेशुल दट रिफरेंस इन हियर मेड ददि कस्टम भाव कठिन भाइ० इ०, दि प्रिमिलेअभाव वीयरिग एक्स्ट्रा रोन्स विच वाज प्रोटेड टु दि रेनी पीजन।-देखिए रैप्सम कृत केटलागाव् दि क्वायस भाव दिपाध्र डिमेटी,दि वेस्टर्न क्षत्रपज, दि कूटक डिनेस्टी ऐंड दि बोधि डिमेस्टी, प्रस्तावना,पृष्ठ ५९॥ २-भारतीय इतिहास की रूपरेखा, भाग २,पृष्ठ ९५०, टिप्पणी । ३-यही, पृष्ठ ९४९, टिप्पणी-संख्या ४ । ४-सिलेक्ट इंस्किशंस बीयरिंग मान इंडियन हिस्टरी ऐंड सिविलिजेशन, भाग पृष्ठ १५९,टिप्पणी-सख्या ३ । ५--प्राचीन भारतवर्ष (गुजराती संस्करण), भाग ५,पृष्ठ ११९,३५३ । ६-पिशक और बूकर द्वारा संपादित देशोनाममाला, वर्ग २, रसोड ३५, पृष्ठ ८३॥ पाश्मसहमहरायावो, पुण्ठ ३२३ ।