पृष्ठ:निर्मला.djvu/१०३

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निर्मला १००

स्त्री-पुरुष के सम्बन्ध से कुछ कम घनिष्ट है? अगर मुझे उनके सम्पूर्ण प्राधिपत्य से ईर्ष्या नहीं होती-वह जो चाहें करें, मैं मुंह नहीं खोल सकता-तो वह मुझे पितृ-स्नेह से क्यों वञ्चित करना चाहती हैं। वह अपने साम्राज्य में क्यों मुझे एक अङ्गुल भर भूमि भी देना नहीं चाहतीं? आप पक्के महल में रह कर क्यों मुझे वृक्ष की छाया में बैठे नहीं देख सकती? हाँ,वह समझती होंगी कि यह बड़ा होकर मेरे पति की सम्पत्ति का स्वामी हो जायगा, इसलिए इसे अभी से निकाल देना अच्छा है। उनको कैसे विश्वास दिलाऊँ कि मेरी ओर से यह शङ्का न करें? उन्हें क्योंकर बताऊँ कि मन्साराम विष खाकर प्राण दे देगा, इसके पहले कि वह उनका क्यां हित करे? उसे चाहे कितनी ही कठिनाइयाँ सहनी पड़ें, वह उनके हृदय का शूल न बनेगा। यों तो पिता जी ने मुझे जन्म दिया है और अब भी मुझ पर उनका स्नेह कम नहीं है, लेकिन क्या मैं इतना भी नहीं जानता कि जिस दिन पिता जी ने उनसे विवाह किया, उसी दिन उन्होंने हमें अपने हृदय से बाहर निकाल दिया? अब हम अनाथों की भाँति यहाँ पड़े रह सकते हैं, इस घर पर हमारा कोई अधिकार नहीं है। कदाचित् पूर्व संस्कारों के कारण यहाँ अन्य अनाथों से हमारी दशा कुछ अच्छी है;, पर हैं अनाथ ही। हम उसी दिन अनाथ हुए, जिस दिन अम्माँ जीपरलोक सिधारी। जो कुछ कसर रह गई थी, वह इस विवाह ने पूरी कर दी। मैं तो खुद पहले इनसे विशेष सम्बन्ध न रखता था। अगर उन्हीं दिनों पिता