पृष्ठ:निर्मला.djvu/११७

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निर्मला
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निर्मला-तूने पूछा नहीं,लड्डू क्यों लौटाए देते हो?

भुङ्गी-यह तो नहीं पूछा बहू जी,झूठ क्यों बोलूं। उन्होंने कहा इसे लेती जा,यहाँ रखने का कुछ काम नहीं, मैं लेती आई।

निर्मला और कुछ नहीं कहते थे। पूछा नहीं,कल क्यों नहीं पाए ? छुट्टी तो थी।

भुङ्गी-बहू जी,झूठ क्यों बोलू;यह पूछने की तो मुझे सुध ही न रही। हाँ, यह कहते थे कि अब तू यहाँ कभी न आना, न मेरे लिए कोई चीज लाना;और अपनी बहू जी से कह देना कि मेरे पास कोई चिट्ठी-पत्तर न भेजें; लड़कों से भी- मेरे पास कोई सन्देशा न भेजें। और एक बात ऐसी कही बहू जी कि मेरे मुँह से निकल नहीं सकती। फिर रोने लगे।

निर्मला-कौन बात थी? कह तो।

भुङ्गी क्या कहूँ बहू जी,कहते थे मेरे जीने को धिक्कार है। यही कह कर रोने लगे!

निर्मला के मुँह से एक ठण्डी साँस निकल गई। ऐसा मालूम हुआ, मानो कलेजा बैठा जाता है। उसका रोम-रोम आर्तनाद से रुदन करने लगा। वह वहाँ बैठी न रह सकी। जाकर बिस्तर पर मुह ढाँप कर लेट रही-और फूट-फूट कर रोने लगी। 'वह भी जान गए'उसके अन्तःकरण में बार-बार यही आवाज गजने लगी-वह जान गए! भगवान् अब क्या होगा? जिस सन्देह की आग में वह भस्म हो रही थी,अब शत-गुण वेग से धधकने लगी। उसे अपनी कोई चिन्ता न थी। जीवन में अब सुख की