पृष्ठ:निर्मला.djvu/१२३

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निर्मला
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बाधाओं पर विजय पाना और अवसर देख कर काम करना ही मनुष्य का कर्तव्य है। भाग्य के नाम को रोने और कोसने से क्या होगा? इतने में जियाराम पाकर खड़ा हो गया।

मन्साराम ने पूछा-घर का क्या हाल है जिया? नई अम्माँ जी तो बहुत प्रसन्न होंगी?

जिया०-उनके मन का हाल तो मैं नहीं जानता; लेकिन जव से तुम आए हो, उन्होंने एक जून भी खाना नहीं खाया। जब देखो तब रोया ही करती हैं। जब बाबू जी आते हैं, तब अलबत्ता हँसने लगती हैं। तुम चले आए, तो मैं ने भी शाम को अपनी किताबें सँभाली। यहीं तुम्हारे साथ रहना चाहता था। भुङ्गी चुडैलने जाकर अम्माँ जी से कह दिया। बाबू जी बैठे थे, उनके सामने ही अम्माँ जी ने आकर मेरी किताबें छीन ली;और रोकर बोलोंतुम भी चले जाओगे, तो इस घर में कौन रहेगा? अगर मेरे 'कारण तुम लोग घर छोड़-छोड़ कर भागे जा रहे हो,तो लो मैं ही कहीं चली जाती हूँ! मैं तो भल्लाया हुआ था ही, वहाँ बाबू जी भी न थे; बिगड़ कर बोला-आप क्यों कहीं चली जाएँगी! आपका तो घर है, आप आराम से रहिए। गैर तो हमी लोग हैं। हम न रहेंगे, तब तो आपको आराम ही आराम रहेगा।

मन्साराम-तुमने खूब कहा,बहुत ही अच्छा कहा। इस पर और भी भलाई होंगी और जाकर बाबू जी से शिकायत की होगी?