पृष्ठ:निर्मला.djvu/१३७

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है
निर्मला
१३४
 
उसे भाँति-भाँति के स्वप्न दिखाई देने लगे। थोड़ी देर के बाद चौंक पड़ता-आँखें खुल जाती;फिर बेहोश हो जाता।

सहसा वकील साहब की आवाज़ सुन कर वह चौंक पड़ा। हाँ, वकील साहब ही की आवाज़ थी। उसने लिहाफ़ फेंक दिया और चारपाई से उतर कर नीचे खड़ा हो गया। उसके मन में एक आवेग हुआ कि इसी वक्त इनके सामने प्राण दे दूं। उसे ऐसा मालूम हुआ कि मैं मर जाऊँ,तो इन्हें सच्ची खुशी होगी। शायद इसीलिए यह देखने आए हैं कि मेरे मरने में कितनी देर है। वकील साहब ने उसका हाथ पकड़ लिया,जिसमें वह गिर न पड़े और पूछा-कैसी तबीयत है लल्लू,लेटे क्यों न रहे? लेट जाओ, लेट जाओ,तुम खड़े क्यों हो गए?

मन्साराम-मेरी तबीयत तो बहुत अच्छी है। आपको व्यर्थ ही कष्ट हुआ।

मुन्शी जी ने कुछ जवाब न दिया। लड़के की दशा देख कर उनकी आँखों से आँसू निकल आए। वह हृष्ट-पुष्ट बालक,जिसे देख कर चित्त प्रसन्न हो जाता था,अब सूख कर काँटा हो गया था। पाँच-छः दिन में ही वह इतना दुबला हो गया था कि उसे पहचानना कठिन था। मुन्शी जी ने उसे आहिस्ता से चारपाई पर लिटा दिया;और लिहाफ अच्छी तरह ओढ़ा कर सोचने लगे कि अब क्या करना चाहिए। कहीं लड़का हाथ से तो न जायगा? यह ख्याल करके वह शोक से विह्वल हो गए;और स्टूल पर बैठ कर फूट-फूट कर रोने लगे। मन्साराम भी लिहाफ में मुँह लपेटे