पृष्ठ:निर्मला.djvu/१३८

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दसवाँ परिच्छेद
 

रो रहा था। अभी थोड़े ही दिनों पहले उसे देख कर पिता का हृदय गर्व से फूल उठता था लेकिन आज उसे इस दारुण दशा में देख कर भी वह सोच रहा है कि इसे घर ले चलूं या नहीं। क्या यहाँ दवा नहीं हो सकती? मैं यहाँ चौबीसों घण्टे बैठा रहूँगा। डॉक्टर साहब यहाँ हैं ही,कोई दिक्कत न होगी। घर ले चलने में उन्हें बाधाएँ ही बाधाएँ दिखाई देती थीं;सबसे बढ़ा भय यह था कि वहाँ निर्मला इसके पास हरदम वैठी रहेगी; और मैं मना न कर सकूँगा यह उनके लिए असह्य था।

इतने में अध्यक्ष ने आकर कहा-मैं तो समझता हूँ,आप इन्हें अपने साथ ले जायँ। गाड़ी है ही, कोई तकलीफ न होगी। यहाँ अच्छी तरह देख-भाल न हो सकेगी।

मुन्शी जी-हाँ,आया तो मैं इसी ख्याल से था;लेकिन इनकी हालत बहुत ही नाजुक मालूम होती है। जरा सी असावधानी होने से सरसाम हो जाने का भय है।

अध्यक्ष-यहाँ से उन्हें ले जाने में तो थोड़ी सी दिक्कत जरूर है। लेकिन यह तो आप खुद ही सोच सकते हैं कि घर पर जो आराम मिल सकता है,वह यहाँ किसी तरह नहीं मिल सकता। इसके अतिरिक्त किसी बीमार लड़के को यहाँ रखना,नियम-विरुद्ध भी है।

'मुन्शी जी-कहिए तो मैं हेडमास्टर से आज्ञा ले लूं। मुझ इनको यहाँ से इस हालत में ले जाना किसी तरह मुनासिब नहीं. मालूम होता।