पृष्ठ:निर्मला.djvu/१६८

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तेरहवाँ परिच्छेद
 
तो वह पिता के विरोध करने पर भी उसे रो-धोकर वनवा लेता है!क्या ऐसे महत्व के विषय में वह अपनी आवाज़ पिता के कानों तक नहीं पहुंचा सकता? यह कहो कि वर और उसका पिता दोनों ही अपराधी हैं,परन्तु वर अधिक। बूढ़ा आदमी सोचता है-मुझे तो सारा खर्च सँभालना पड़ेगा, कन्या-पक्ष से जितना ऐंठ सकूँ, उतना ही अच्छा! मगर यह वर का धर्म है कि वह यदि बिलकुल स्वार्थ के हाथों विक नहीं गया है,तो अपने आत्म-बल का परिचय दे! अगर वह ऐसा नहीं करता, तो मैं कहूँगी कि वह लोभी भी है और कायर भी! दुर्भाग्यवश ऐसा ही एक प्राणी मेरा पति है;और मेरी समझ में नहीं आता कि किन शब्दों में उसका तिरस्कार करूं?

सिन्हा ने हिचकिचाते हुए कहा-वह... वह... वह दूसरी बात थी। लेन-देन का कारण नहीं था; बिलकुल दूसरी बात थी! कन्या के पिता का देहान्त हो गया था। ऐसी दशा में हम लोग क्या करते? यह भी सुनने में आया था कि कन्या में कोई ऐव है। वह बिलकुल दूसरी बात थी; मगर तुमसे यह कथा किसने कही?

सुधा-कह दो कि वह कन्या कानी थी,कुबड़ी थी या नाइन के पेट की थी या भ्रष्टा थी! इतनी कसर क्यों छोड़ दी? भला सुन तो, उस कन्या में क्या ऐव था?

सिन्हा-मैं ने देखा तो था नहीं, सुनने में आया था कि उस में कोई ऐव है।