पृष्ठ:निर्मला.djvu/१८२

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पन्द्रहवाँ परिच्छेद
 

तेरा सगा-सम्बन्धी तो नहीं है? वकील साहब ने तुझसे छिपा कर तो नहीं भेजे?

निर्मला- नहीं अम्माँ,मुझे तो विश्वास नहीं।

माता-इसका पता लगाना चाहिए। मैने सारे रुपए कृपणा के गहने कपड़े में खर्च कर डाले। यही बड़ी मुश्किल हुई।

दोनों लड़की में किसी विषय पर विवाद उठ खड़ा हुआ;और कृपणा उधर फैसला करने चली गई,तो निर्मला ने माता से कहाइस विवाह की बात सुन कर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। यह कैसे हुआ अम्मॉ?

माता-यहाँ जो सुनता है,दाँतों उँगली दवाता है। जिन लोगों ने पकी की-कराई वात फेर दी; और केवल थोड़े से रुपए के लोभ से! वे अव विला कुछ लिए कैसे विवाह करने पर तैयार हो गये, समझ में नहीं आता। उन्होंने खुद ही पत्र भेजा। मैंने साफ लिख दिया कि मेरे पास देने लेने को कुछ नहीं है; कुश-कन्या ही से आपकी सेवा कर सकती हूँ।

निर्मला-इसका कुछ जवाब नहीं दिया?

माता-शास्त्री जी पत्र लेकर गए थे। वह तो यह कहते थे कि अव मुन्शी जी कुछ लेने के इच्छुक नहीं हैं। अपनी पहली वादा- खिलाफी पर कुछ लज्जित भी हैं। मुन्शी जी से तो इतनी उदारता की आशा न थी, मगर सुनती हूँ उनके बड़े पुत्र बहुत सजन आदमी हैं। उन्होंने कह-सुन कर वाप को राजी किया है। निर्मला-पहले तो वह महाशय भी थैली चाहते थे न?