पृष्ठ:निर्मला.djvu/२०२

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सत्रहवाँ परिच्छेद
 

नकील साहव रो पड़ते हैं। अरे और तो क्या कहूँ, एक दिन पत्थर उठा कर मारने दौड़ा था!

निर्मला ने गम्भीर चिन्ता में पड़ कर कहा-यह लड़का तो वड़ा शैतान निकला। उससे यह किसने कहा कि उसके भाई को उन्होंने जहर दे दिया है।

सुधा-वह तुम्हीं से ठीक होगा।

निर्मला को यह नई चिन्ता पैदा हुई! अगर जिया का यही रङ्ग है-अपने वाप से लड़ने पर तैयार रहता है,तो मुझसे क्यों दवने लगा? वह रात को बड़ी देर तक इसी फिक्र में डूबी रही। मन्साराम की आज उसे बहुत याद आई। उसके साथ जिन्दगी आराम से कट जाती। इस लड़के का जब अपने पिता के सामने ही यह हाल है,तो उनके पीछे उसके साथ कैसे निबाह होगा। घर हाथ से निकल ही गया। कुछ न कुछ क़र्ज़ अभी सिर पर होगा ही! आमदनी का यह हाल!! ईश्वर ही बेड़ा पार लगावेंगे! आज पहली बार निर्मला को बच्ची की फिक्र पैदा हुई! इस वेचारी का न जाने क्या हाल होगा? ईश्वर ने यह विपत्ति भी सिर डाल दी! मुझे तो इसकी ज़रूरत न थी। जन्म ही लेना था,तो किसी भाग्यवान् के घर जन्म लेती। बच्ची उसकी छाती से लिपटी हुई सो रही थी। माता ने उसको और भी चिमटा लिया, मानो कोई उसके हाथ से उसे छीने लिए जाता है!!

निर्मला के पास ही सुधा की चारपाई भी थी। निर्मला तो चिन्ता-सागर में गोता खा रही थी;और सुधा मीठी नींद का