पृष्ठ:निर्मला.djvu/२०४

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सत्रहवाँ परिच्छेद
 

है और मेरे ही साथ जागता है। उस जन्म का कोई तपस्वी है। देखो,इसके माथे पर तिलक का कैसा निशान है। बाँहो पर भी ऐसे ही निशान हैं। जरूर कोई तपस्वी है।

 निर्मला-तपस्वी लोग तो चन्दन-तिलक नहीं लगाने। उस जन्म का कोई धूर्त पुजारी होगा। क्यों रे,तू कहाँ का पुजारी था? बता!
 सुधा-इसका व्याह में बच्ची से करूँगी!
 निर्मला-चलो बहिन,गाली देती हो। बहिन से भी भाई का व्याह होता है?
 सुधा-मैं तो करूँगी,चाहे कोई कुछ कहे। ऐसी सुन्दर बहू और कहाँ पाऊँगी। जरा देखो तो बहिन,इसकी देह कुछ गर्म है या मुझ ही को मालूम होती है!
 निर्मला ने सोहन का माथा छूकर कहा-नहीं,नहीं,देह गर्म है। यह ज्वर कब आ गया? दूध तो पी रहा है न?
 सुधा-अभी सोया था,तब तो देह ठण्डी थी। शायद सर्दी लग गई, ओढ़ा कर सुलाए देती हूँ। सवेरे तक ठीक हो जायगा।
 सबेरा हुआ तो सोहन की दशा और भी खराब हो गई। उसकी नाक बहने लगी और बुखार और भी तेज हो गया। आँखें चढ़ गई और सिर झुक गया। न वह हाथ पैर हिलाता था, न हँसता-बोलता था;बस चुपचाप पड़ा था। ऐसा मालूम होता था कि उसे इस वक्त किसी का बोलना अच्छा नहीं लगता।