पृष्ठ:निर्मला.djvu/२०५

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निर्मला
२०२
 

कुछ-कुछ खाँसी भी आने लगी। अब तो सुधा घबराई। निर्मला की भी राय हुई कि डॉक्टर साहब को बुलाया जाय;लेकिन उसकी बूढ़ी माता ने कहा-डॉक्टर-हकीम का यहाँ कुछ काम नहीं। साफ तो देख रही हूँ कि बच्चे को नजर लग गई है। भला डॉक्टर आकर क्या करेगा?

सुधा-अम्माँ जी,भला यहाँ नज़र कौन लगा देगा? अभी तक तो बाहर कहीं गया भी नहीं!

माता-नज़र कोई लगाता नहीं बेटी,किसी-किसी आदमी की दीठ ही बुरी होती है-आप ही आप लग जाती है। कभी-कभी माँ-बाप तक की नजर लग जाती है। जबसे आया है,एक बार भी नहीं रोया। चोचले बच्चों की यही गति होती है। मैं तो इसे हुमकते देख कर डरी थी कि कुछ न कुछ अनिष्ट होने वाला है। आँखें नहीं देखती हो कितनी चढ़ गई हैं। यही नजर की सबसे बड़ी पहिचान है।

बुढ़िया महरी और पड़ोस की पण्डिताइन ने इस कथन का अनुमोदन कर दिया। बस,मँहगू ओझा बुला लिया गया। मँहगू ने आकर बच्चे का मुंह देखा और हँस कर बोला-मालिकिन,यह दीठ है और कुछ नहीं। जरा पतली-पतली तीलियाँ तो मँगवा दीजिए। भगवान् ने चाहा,तो सझा तक बच्चा हँसने-खेलने लगेगा।

सरकण्डे के पाँच टुकड़े लाए गए। मँहगू ने उन्हें बराबर करके एक डोरे से बाँध दिया और कुछ बुदबुदा कर उसी पोले