पृष्ठ:निर्मला.djvu/२१

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निर्मला
१८
 


हो जायगी। एक बार इनका घमण्ड तोड़ ही दूँ, जरा वैधव्य का मजा भी चखा दूँ। न जाने इनकी हिम्मत कैसे पड़ती है कि मुझे यों कोसने लगती हैं? मालूम होता है प्रेम इन्हें छू नहीं गया या समझती हैं यह घर से इतना चिमटा हुआ है; कि इसे चाहे जितना कोसूँ, टलने का नाम न लेगा। यही बात है; पर यहाँ संसार से चिपटने वाले जीव नहीं हैं। जहन्नुम में जाय वह घर; जहाँ ऐसे प्राणियों से पाला पड़े। घर है या नरक! आदमी बाहर से थका-माँदा आता है, तो घर में उसे आराम मिलता है। यहाँ आराम के बदले कोसने सुनने पड़ते हैं। मेरी मृत्यु के लिए व्रत रक्खे जाते हैं। यह है पचीस बरस के दाम्पत्य जीवन का अन्त! बस चल ही दूँ। जब देख लूँगा कि इनका सारा घमण्ड धूल में मिल गया; और मिज़ाज ठण्ढा हो गया, तो लौट आऊँगा। चार-पाँच दिन काफ़ी होंगे। ले, तुम भी क्या याद करोगी कि किसी से पाला पड़ा था।

यही सोचते हुए बाबू साहब उठे, रेशमी चादर गले में डाली, कुछ रुपये लिए, अपना कार्ड निकाल कर एक दूसरे कुर्ते के जेब में रक्खा, छड़ी उठाई; और चुपके से बाहर निकले। सब नौकर नींद में मस्त थे। कुत्ता आहट पाकर चौंक पड़ा; और उनके साथ हो लिया।

पर यह कौन जानता था कि यह सारी लीला विधि के हाथों रची जा रही है। जीवन-रङ्गशाला का वह निर्दय सूत्रधार किसी अगम्य, गुप्त स्थान पर बैठा हुआ अपनी जटिल क्रूर-क्रीड़ा दिखा रहा है? यह कौन जानता था कि नकल असल होने जा रही है, अभिनय सत्य का रूप ग्रहण करने वाला है?