पृष्ठ:निर्मला.djvu/२३१

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निर्मला
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गई। चौंक कर उठ खड़ी हुई। द्वार पर आकर देखा। कलेजा धक से हो गया! क्या यह जियाराम है? मेरे कमरे में क्या करने आया था? कहीं मुझे धोखा तो नहीं हुआ? शायद दीदी जी के कमरे से आया हो। यहाँ उसका काम ही क्या था? शायद मुझसे कुछ कहने आया हो; और सोता देख कर चला गया हो; लेकिन इस वक्त क्या कहने आया होगा? इसकी नीयत क्या है? उसका दिल काँप उठा!

मुन्शी जी अपर छत पर सो रहे थे। मुंडेर न होने के। कारण निर्मला ऊपर न सो सकती थी। उसने सोचा, चल कर उन्हें जगाऊँ; पर जाने की हिम्मत न पड़ी। शक्की आदमी हैं, न जाने क्या समझ बैठें; और क्या करने पर तैयार हो जायँ! आकर फिर वही पुस्तक पढ़ने लगी। सबेरे पूछने पर श्राप ही मालूम हो जायगा। कौन जाने मुझे धोखा ही हुआ हो। नींद में कभी धोखा हो जाता है; लेकिन सबेरे पूछने का निश्चय करने पर भी उसे फिर नींद नहीं आई।

सबेरे वह जल-पान लेकर स्वयं जियाराम के पास गई, तो वह उसे देख कर चौंक पड़ा। रोज़ तो भुङ्गी आती थी, आज यह क्यों आ रही हैं? निर्मला की ओर ताकने की उसकी हिम्मत न पड़ी।

निर्मला ने उसकी ओर विश्वासपूर्ण नेत्रों से देख कर पूछारात को तुम मेरे कमरे में गए थे?

जियाराम ने विस्मय दिखा कर कहा-मैं! भला मैं रात को क्या करने जाता? क्या कोई गया था?